गंगा में प्रदूषण का असर अब जलीय जीव जंतुओं पर पड़ने लगा है। अचानक डॉल्फिन मछलियां गायब होने वजह से भारतीय वन्य जीव संस्थान की टीम हैरान है। हम बात कर रहे हैं कानपुर की गंगा नदी के बारे में। कानपुर के गंगा बैराज से लेकर जाजमऊ के बीच गंगेटिक डाल्फिन गायब हैं। कानपुर की गंगा का यह वही क्षेत्र है, जो सबसे अधिक प्रदूषित माना जाता है। पिछले दिनों प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच में इस क्षेत्र में गंगाजल में आक्सीजन की मात्रा घटकर चेतावनी बिंदु (5.3 मिलीग्राम प्रति 100 मिली पानी में) तक आ गई था। सोमवार को भारतीय वन्य जीव संस्थान के विशेषज्ञों की एक टीम गंगा के जल की गुणवत्ता का सर्वे करने आई तो उन्हें डाल्फिन कहीं नहीं दिखी। जब यहां के नाविकों से पूछा तो उन्होंने भी डाल्फिन नहीं दिखने की बात कही। अमर उजाला की टीम भी इनके साथ रही।
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कानपुर की गंगा का यह वही क्षेत्र है जहां सबसे ज्यादा है प्रदूषण
यह सर्वे इस लिहाज से किया जा रहा है कि गंगा का पानी डाल्फिन के रहने लायक है या नहीं। टीम जगह-जगह गंगाजल के प्रदूषण की स्थिति की पड़ताल कर रही है। नाव के जरिए टीम के सदस्यों ने करीब 10 किलोमीटर गंगा के क्षेत्र में जल का परीक्षण किया। इस दौरान उन्हें कहीं भी डाल्फिन नजर नहीं आई। करीब एक साल पहले जब वन्य जीव संस्थान की टीम यहां डाल्फिन व गंगा में पाए जाने वाले अन्य जीव जंतुओं की पड़ताल करने आई थी, उस समय उनकी रिपोर्ट में बिजनौर से बिठूर तक गंगा में इन जीव जंतुओं की संख्या काफी अच्छी मिली थी, लेकिन बैराज से जाजमऊ के बीच की स्थिति ठीक नहीं थी। माना जा रहा है कि इस बीच इस क्षेत्र में गंगा में प्रदूषण की स्थिति और भी खराब हुई है।
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डेमो पिक
इसी वजह से डाल्फिन इस क्षेत्र को अपना घर नहीं बना पा रही है। केंद्र सरकार के गंगा मंत्रालय की यही चिंता है कि गंगा में जीव जंतुओं की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हो। इसीलिए सरकार की विभिन्न एजेंसियों के जरिए सर्वे किया जा रहा है। सर्वे करने आई टीम के सदस्य डा. विनीत कुमार मानते हैं कि गंगा में यदि जीव जंतुओं की संख्या बढ़ती है तो इसका सीधा अर्थ होगा कि गंगाजल में प्रदूषण का कम होना।
भारतीय वन्य जीव संस्थान की टीम सोमवार को जब गंगा बैराज से जाजमऊ के बीच सर्वे पर निकली तो उसे रास्ते में कई छोटे बड़े नाले गंगा में गिरते दिखे । कानपुर की गंगा में करीब 21 नाले सीधे गिरते हैं। काफी वर्षों की कवायद के बाद अब जाकर छह बड़े नालों की टैपिंग का काम शुरू हो गया है। इसमें दो साल से अधिक का समय लग सकता है। इस वजह से भी गंगा के इस क्षेत्र में प्रदूषण को कम करना मुश्किल जान पड़ता है।