यदि आप हिंसा की शिकार हैं। पति, ससुरालीजन या अन्य परिजन परेशान करते हैं, तो घबराएं नहीं। कोई गलत कदम न उठाएं। कानून का सहारा लें। न्याय जरूर मिलेगा। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 को 26 अक्टूबर 2006 में लागू किया गया था। इसके तहत हर जिले में संरक्षण अधिकारी की नियुक्ति भी की गई है। यह अधिकारी पीड़ित को कानूनी मदद दिलाते हुए शिकायत मजिस्ट्रेट केसामने पेश करता है। पीड़ित की मदद के लिए एक काउंसलर भी मिलता है।
विज्ञापन
ये हैं घरेलू हिंसा
- शारीरिक-धक्का देना भी शारीरिक उत्पीड़न
- मानसिक-कोई बंदिश लगाकर परेशान करना
- यौन शोषण-संबंध बनाने के लिए मजबूर करना
- भावनात्मक शोषण-भावनाओं को ठेस पहुंचाना
- आर्थिक अत्याचार-जेब खर्च न देना और लेना
मिल सकती है क्षतिपूर्ति
बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष सुरेश सिंह चौहान का कहना है कि इस अधिनियम के तहत अनुतोष (क्षतिपूर्ति) दिलाने का प्रावधान है। किसी तरह की कोई सजा का प्रावधान नहीं है। सेक्शन 20 में चिकित्सा, खर्च दिलाने, बच्चों की फीस दिलाने और अन्य प्रकार के मुआवजे का प्रावधान है। सेक्शन 22 में मानसिक और भावनात्मक संकट पर प्रतिकर दिलाया जाता है।
डेमो पिक
लिविंग रिलेशनशिप पर भी लागू
बार एसोसिएशन के पूर्व महामंत्री अनूप द्विवेदी के मुताबिक घरेलू हिंसा अधिनियम के सेक्शन तीन में प्रावधान किया गया है कि अगर कोई बिना शादी के पति-पत्नी की तरह रह रहा है, तो उस पर यह अधिनियम लागू होगा। किसी तरह के उत्पीड़न पर महिला शिकायत दर्ज करा सकेगी।
संयुक्त परिवार से हो सकते हैं अलग
अधिवक्ता शिवाकांत दीक्षित का कहना है कि इस अधिनियम की सेक्शन 19 (क) में प्रावधान है कि साझी गृहस्थी में अगर उत्पीड़न हो रहा है, तो वह संयुक्त परिवार से अलग हो सकती हैं। 19 (ख) में उत्पीड़न करने वाले को गृहस्थी से हटने को कहा जाता है।
कोई भी दे सकता हिंसा की सूचना
अधिवक्ता वसीम अख्तर ने बताया कि इस अधिनियम के सेक्शन चार में प्रावधान है कि घरेलू हिंसा की जानकारी पीड़ित ही नहीं कोई भी दे सकता है। अगर किसी के पड़ोस में किसी महिला का उत्पीड़न हो रहा है, तो वह शिकायत कर सकती है।
डेमो पिक
बच्चे भी कर सकते हैं शिकायत
अधिवक्ता शैलेंद्र पांडेय का कहना है कि इस अधिनियम में बच्चों को भी संरक्षण दिया गया है। सेक्शन 2 (बी) में यह प्रावधान है। मुबंई में एक बच्चे ने अपने पिता के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था। अदालत ने पिता को धारा 20 (2) के तहत बच्चे केबालिग होने तक फीस भुगतान का आदेश दिया था।
घरेलू हिंसा के 12 हजार मुकदमे
जिला प्रोबेशन अधिकारी दफ्तर के मुताबिक एक्ट बनने के बाद से अब तक शहर में घरेलू हिंसा के करीब 12 हजार मामले आए हैं। जिला प्रोबेशन अधिकारी अजीत कुमार ने बताया कि इन मामलों में समझौते के प्रयास होते हैं। कोर्ट प्रोबेशन दफ्तर को मामले भेजकर समझौते के प्रयास को कहती है। इसके लिए काउंसलिंग कराई जाती है। दहेज उत्पीड़न के साथ इस एक्ट के तहत भी महिलाएं शिकायत दर्ज कराती हैं।
मुफ्त वकील की सुविधा
कोई भी महिला अपने मुकदमे के लिए मुफ्त में वकील ले सकती है। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में इसके लिए अर्जी दी जाती है। वहां से उन्हें मुफ्त में वकील मिल जाता है। तलाक, विदाई, घरेलू हिंसा, गुजारा भत्ता के मुकदमे कोई भी महिला अपने मायके यानी गृह जनपद की कोर्ट में दाखिल कर सकती है। इसके लिए घटनास्थल वाला फार्मूला लागू नहीं होता है।
केस-1
कानपुर के मकराबटगंज कॉलोनी निवासी शाहिन का विवाह उन्नाव निवासी मो. रफीक के साथ 2011 में हुआ था। शाहिन ने आरोप लगाया कि ससुराली-जन उसे कम दहेज का ताना देते थे। शाहिन ने इसका विरोध किया और 2014 में पिता के साथ मायके चली आई। कई बार ससुरालीजनों से समझौते का प्रयास किया, लेकिन बात नहीं बनी। तब शाहिन ने न्यायालय की शरण ली। ससुराली-जनों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज कराने के साथ पारिवारिक न्यायालय में भरण-पोषण भत्ते के लिए परिवाद दर्ज किया। शाहिन ने चार साल तक कोर्ट के चक्कर काटे। लेकिन पारिवारिक न्यायालय ने सुनवाई के बाद मो. रफीक को 5000 रुपया गुजारा भत्ता अदा करने का आदेश दिया है। शाहिन के अधिवक्ता विजय कुमार सिन्हा ने बताया कि दहेज उत्पीड़न का मुकदमा न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन चार साल की लड़ाई के बाद न्यायालय के गुजारा भत्ता देने के आदेश से शाहिन को कुछ राहत मिली है।
केस- 2
हेमंत विहार बर्रा निवासी 70 वर्षीय सुधा मिश्रा ने अपने ही बेटे और बहुओं के खिलाफ न्यायालय में घरेलू हिंसा का मुकदमा दर्ज कराया है। आरोप है कि बेटे आशीष, आनंद और बहू दीपा व तृप्ति उन्हें शारीरिक, मानसिक व आर्थिक रूप से प्रताड़ित करते हैं। उनके खाने-पीने, कपड़े, दवा-इलाज का प्रबंध नहीं करते। उनके पति के देहांत के बाद जबरन घर में कब्जा कर लिया है और उन्हें धमकाते हैं। उन्होंने एसडीएम सदर की कोर्ट में भी माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया था। इसमें कोर्ट ने बेटे-बहुओं को घर से बेदखल करने के आदेश के साथ ही दोनों बेटों को मां के गुजारे के लिए तीन-तीन हजार रुपये प्रतिमाह देने के आदेश दिया। सुधा के अधिवक्ता संजीव कुमार शर्मा ने बताया कि एक बुजुर्ग महिला, जो अपने ही घर में अपने ही बेटों से प्रताड़ित थी, कोर्ट के आदेश से उसे सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत करने का अधिकार मिला।
केस- 3
फेथफुलगंज निवासी शाहिदा परवीन का निकाह 1997 को जूही रेलवे कालोनी निवासी शमीम अख्तर के साथ हुआ था। 2005 में अचानक शाहिदा को पता चला कि शमीम पहले से शादीशुदा था। उसकी पहली पत्नी हुस्ना बानो जूही रेलवे कालोनी में रहती है। इसके बाद दोनों में विवाद शुरू हो गया। शमीम ने शाहिदा को घर से निकाल दिया। 2006 में शाहिदा जूही स्थित शमीम के घर पहुंची तो पति, उसकी पहली पत्नी व ससुरालीजनों ने मिलकर शाहिदा को मारापीटा। शाहिदा ने सात लोगों के खिलाफ जूही थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी। 20 दिन में ही पुलिस ने चार्जशीट भी कोर्ट में दाखिल कर दी। 12 साल चली लंबी लड़ाई के बाद कोर्ट से शाहिदा को न्याय मिला और कोर्ट ने सभी ससुरालीजनों को मारपीट का दोषी माना। शाहिदा के अधिवक्ता रवींद्र शर्मा ने बताया कि देर से ही सही, लेकिन शाहिदा को शारीरिक व मानसिक पीड़ा देने वाले पति और ससुरालीजनों के दोषी साबित होने से शाहिदा ने राहत की सांस ली है।