डकैती भारत में न जाने कब से चली आ रही है। अमीरों और गरीबों के बीच किसी के लिए ‘यमराज’ और किसी का ‘मसीहा’ बनने वाले ये डकैत असल में बागी कहे जाते थे। कुछ डाकू अपने माथे पर लगे उस टीके के लिए मशहूर हैं जो सरकार के विरुद्ध छिड़ी जंग का प्रतीक माना जाता है तो कुछ उन लम्बे बालों और बड़ी-बड़ी मूंछों के लिए फेमस हैं जो वैराग्य की निशानी भी कही जाती थी। आज हम आपको ऐसे ही उन टॉप फाइव डकैतों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनके नाम से पुलिसवाले भी थर्राते थे। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात तो ये है कि इन टॉप-5 डाकुओं से भी ज्यादा खतरनाक एक ‘लेडी डकैत’ थी जिसने सरकार और पुलिस की नाक में दम कर दिया था।
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डाकू मान सिंह की तस्वीर लिये उनका रिश्तेदार
85 मर्डर के बाद भी मंदिर में होती है मान सिंह की पूजा
चंबल के डाकू विश्व विख्यात हैं। 1939 से 1955 तक चंबल में दस्यु सरगना मान सिंह की तूती बोलती थी। डकैत मान सिंह पर लूट के 1,112 तथा हत्या के 185 मामले दर्ज थे, लेकिन गरीबों में उसकी छवि रॉबिन हुड की तरह थी। मजबूर और कमजोर लोगों को हक दिलाने के लिए मान सिंह ने जरुर खूनी खेल खेले लेकिन उसने कभ किसी असहाय को नहीं सताया। कहते हैं कि उसने जीवन में कभी किसी महिला का अपहरण नहीं किया और ना ही किसी बच्चे की हत्या की। डाकू मान सिंह के जमीन पर साहूकारों द्वारा कब्ज़ा कर लिया गया। उस वक़्त डाकू बनने की अधिकतर घटनाएं जमीन पर कब्जा किए जाने के कारण ही होती थी। जमीन के अवैध कब्जे को छुड़ाने के लिए मान सिंह ने प्रयास किया लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। घटना से आहत मान सिंह को लगा कि अब राजपूतों का वर्चस्व खतरे में है। इसलिए उसे बचाने और जमीन वापस लेने के लिए उसने जुल्म ढाने वालों के खिलाफ हथियार उठा लिये थे।
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वीरप्पन
2000 हाथियों और 184 लोगों को मारने वाला वीरप्पन
लंबी-लंबी हैंडलबार मूछें हो या उसका दो-दो राज्यों की पुलिस को 20 सालों तक लगातार चैन से न बैठने देना हो, लोग अभी भी चंदन तस्कर वीरप्पन को नहीं भूल पाएं हैं। वीरप्पन के नाम से प्रसिद्ध कूज मुनिस्वामी वीरप्पन (1952-2004) दक्षिण भारत का कुख्यात चंदन तस्कर था। चन्दन की तस्करी के अतिरिक्त वह हाथीदांत की तस्करी, हाथियों के अवैध शिकार, पुलिस तथा वन्य अधिकारियों की हत्या व अपहरण के कई मामलों का भी अभियुक्त था। कहा जाता है कि सरकार ने कुल 20 करोड़ रुपये उसे पकड़ने के लिए खर्च किए (प्रतिवर्ष लगभग 2 करोड़)। 18 अक्टूबर 2004 को उसे मार दिया गया। उसके मरने पर भी कई तरह के विवाद हैं। उसका प्रशिक्षित कुत्ता तथा बंदर उसके मरने के बाद प्रकाश में आए। उसका कुत्ता मथाई कई मामलों में गवाह की भूमिका निभा रहा है। वह भौंक कर अपनी भावना व्यक्त करता है।
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निर्भय गुर्जर
लड़की और शराब का काफी शौकीन था निर्भय
निर्भय गुर्जर चंबल के बीहड़ों का कुख्यात डकैत था। जब 8 नवंबर 2005 में यह पुलिस मुठभेड़ में मारा गया, तब उस पर 2.5 लाख रुपए का इनाम था। इस कुख्यात डकैत की जिंदगी पर महिलाएं काल बनीं और आशिकी के चलते यह पुलिस के हत्थे चढ़ गया। बीहड़ में एक समय डाकू निर्भय गुर्जर का नाम गूंजता था । वह लड़की और शराब का काफी शौकीन था । उसके साथ उसकी दो प्रेमिकाएं सरला और नीलम हमेशा रहती थीं । उसे खुश करने के लिए प्रेमिकाएं हमेशा जींस और टी-शर्ट पहनती थीं ।
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सुल्ताना डाकू
गरीबों के बीच काफी मशहूर था सुल्ताना डाकू
बीसवीं सदी के दूसरे दशक का देश का सबसे दुर्दांत और खतरनाक, लेकिन सबसे लोकप्रिय डाकू सुल्ताना डाकू था, जिसे पकड़ने में अंग्रेज सरकार के भी छक्के छूट गए थे । उसके सामजिक कार्यों के कारण उसे ‘सोशल बैंडिट‘ के नाम से जाना जाता था। उत्तर प्रदेश में अपने अपार जनसमर्थन के कारण वह कई वर्षों तक पुलिस के साथ आंखमिचौली खेलता रहा था। सुल्ताना डाकू गरीबों के बीच काफी मशहूर था। उसे पश्चिमी मीडिया ने रॉबिन हुड का नाम दे रखा था। सुल्ताना डाकू अमीरों से पैसे और कीमती चीज़ें लूटकर गरीबों में बाँट देता था। एक तरह से देखा जाए तो वह गरीब लोगों के लिए ही डकैती करता था। सुल्ताना को ब्रिटिश सरकार ने नजीबाबाद में फांसी देकर मार डाला था।
कहा जाता था कठोर दिल वाली थी फूलन
80 के दशक में चंबल के बिहड़ों में फूलन देवी के नाम की इतना दहशत थी कि बड़े-बड़े लोगों की रूह कांपने लगती थी। कहा जाता था कि वो बहुत कठोर दिल वाली थी। हलांकि इसके पीछे बहुत बड़ा कारण था। जानकारों के मुताबिक फूलन को हालात ने इतना कठोर बना दिया कि उन्होंने बहमई में एक साथ लाइन में खड़ा कर 22 ठाकुरों की हत्या कर दी और उन्हें इसका जरा भी अफसोस नहीं हुआ। चंबल के बीहड़ों से संसद पहुँचने वाली फूलन देवी पर ब्रिटेन में आउटलॉ नाम की एक किताब प्रकाशित हुई है जिसमें उनके जीवन के कई पहलुओं पर चर्चा की गई है। फूलन देवी को मिली जेल की सजा के बारे में पढ़ने के लेखक रॉय मॉक्सहैम ने 1992 में उनसे पत्राचार शुरू किया। जब फूलन देवी ने उनके पत्र का जवाब दिया तो रॉय मॉक्सहैम भारत आए और उन्हें फूलन देवी को करीब से जानने का मौका मिला।