14 फरवरी की सुबह करीब 3:30 बजे जम्मू से फौजियों का जत्था निकला था। 78 गाड़ियों में सीआरपीएफ, एसएसबी व आईटीबीपी की भी कुछ गाड़ियां शामिल थीं। स्लाइडिंग हो रही थी। करीब 350 किमी का लंबा सफर था, बूंदाबांदी हो रही थी। मेरी बस से करीब 500 मीटर आगे अचानक ऐसा लगा कि जैसे आकाशीय बिजली गिरी हो। धमाके से बहुत तेज रोशनी हुई, जिससे सभी चकाचौंध में आ गए।
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विस्फोट इतना तेज था कि कोई कुछ समझ ही नहीं पाया। तत्काल आगे वाली गाड़ी आगे और पीछे वाली गाड़ियां रोक दी गईं। पलक झपकते ही सब कुछ तबाह हो चुका था। हमारे साथियों के चीथड़े उड़ चुके थे। उस दर्दनाक भयानक मंजर को देखकर एकबारगी रूह कांप उठी, और फिर बस आंखों में आक्रोश की नदियां बह उठीं। एक ओर जहां अपनों को खो देने का दर्द था, तो दूसरी ओर देश की सुरक्षा का सवाल था। सब कुछ संभालते हुए सामने खड़ी थी अनुशासन की दीवार।
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यह कहानी श्रीनगर से ‘अमर उजाला’ के साथ फोन पर बयां की सीआरपीएफ जवान कश्मीर सिंह ने, जो स्वयं पुलवामा हमले के दौरान सैनिकों के उसी काफिले में मौजूद थे। छिबरामऊ कोतवाली के गांव कमालपुर के रहने वाले जवान सैनिक कश्मीर सिंह ने आपबीती सुनाकर कहा कि किन्हीं कारणों से जहाज की व्यवस्था नहीं हो सकी। फिर 14 फरवरी की सुबह 3:30 बजे सैनिक गाड़ियों से निकले।
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हादसे के बाद सबसे पहले आया पत्नी का फोन
पुलवामा में हमला होने के बाद सबसे पहले उसकी पत्नी प्रियंका का फोन आया। वह काफी डरी और सहमी हुई थी। कश्मीर सिंह ने बताया कि मुझसे बात करने के बाद भी वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं थी। यही हाल हमारे अन्य परिजनों का था।
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जड़ से समाप्त हो समस्या
सीआरपीएफ जवान कश्मीर सिंह बड़े द्रवित मन से कहते हैं कि उन्हें अपने साथियों को खोने का तो दर्द है, लेकिन क्या करें, फोर्स में सब सहना पड़ता है। हर बात किसी से नहीं की जा सकती, लेकिन इतना जरूर है कि आतंकवाद की समस्या को जड़ से समाप्त होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बदला लेना चाहिए, आतंकवाद और उनको सह देने वालों की जड़ को ही खत्म कर देना चाहिए। मालूम हो कि जनपद कन्नौज का सुखसेनपुर ग्राम पंचायत के अजान गांव के रहने वाले वीर सैनिक प्रदीप सिंह यादव उस आत्मघाती हमले में शहीद हुए हैं।