यूपी में कानपुर देहात के डेरापुर थाना क्षेत्र के कपासी कला गांव के बाहर लंबे समय से झोपड़ी डालकर रह रहे एक साधुवेश धारी की उसके शिष्य ने हत्या कर दी। उसने गर्दन पर धारदार हथियार से कई वार किए। जानकारी होने पर ग्रामीणों ने आरोपी को पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया। मामले में पुलिस ने छानबीन शुरू की। सीओ तेज बहादुर सिंह और थानाध्यक्ष रामबहादुर पाल ने मौके पर छानबीन की। फॉरेंसिक टीम ने साक्ष्य के लिए नमूने लिए। एसओ ने बताया कि नशेबाजी को लेकर हत्या की बात सामने आ रही है। मामले में ग्रामीण नागेंद्र सिंह की तहरीर पर आरोपी के खिलाफ हत्या कर मुकदमा दर्ज कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया।
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जटाधारी बाबा उर्फ रामभजन की हत्या
- फोटो : अमर उजाला
मूलरूप से बिलवाहार अकबरपुर निवासी जटाधारी बाबा उर्फ रामभजन (55) डेरापुर के कपासी कला गांव के बाहर झोपड़ी डालकर लंबे समय से रह रहा था। उसके साथ कपासी कला गांव का ही कृष्ण कुमार भी रहता था। ग्रामीणों के मुताबिक, दोनों में अक्सर नशेबाजी के बाद विवाद हो जाता था। रविवार की सुबह गांव का चंद्रशेखर अपने खेत से मिर्च तोड़कर वहां से निकल रहा था। उसने झोपड़ी के पास खून पड़ा देख ग्रामीणों को सूचना दी।
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जटाधारी बाबा उर्फ रामभजन की हत्या
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मौके पर पहुंचे ग्रामीणों को देखकर बाबा के साथ रहने वाले कृष्ण कुमार ने भागने की कोशिश करने लगा। ग्रामीणों ने उसे पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया। उसने पुलिस को हत्या की कोई ठोस वजह नहीं बताई। उसने बाबा के गर्दन पर धारदार हथियार से कई वार कर मौत के घाट उतारने की बात स्वीकार की। झोपड़ी के आसपास खून पड़ा था।
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जटाधारी बाबा उर्फ रामभजन की हत्या
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करीब 16 वर्ष पूर्व रामभजन उर्फ बाबा जटाधारी बिलवाहार अकबरपुर से कपासी कला गांव गया था। वहां लंबे समय तक गांव के कल्लू के ट्यूबवेल पर रहने के बाद करीब दो साल पहले रूपरानी के खेत के झोपड़ी डालकर रहने लगा था। बाबा वेश में रहने के कारण गांव के लोग उसका सम्मान करतेे थे। वहीं, जटाधारी बाबा को गांव के लोग अपनी इच्छा से खाद्यान्न और रुपये आदि देकर मदद कर देते थे। ग्रामीणों ने बताया कि बाबा स्वाभिमानी था, वह किसी से कभी कुछ मांगता नहीं था। बाबा अपने जीवकोपार्जन के लिए बकरी, गाय आदि पालकर काम चला रहा था।
जटाधारी बाबा उर्फ रामभजन की हत्या
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रामभजन के भाई बिलवाहार निवासी श्रीराम, भतीजे और अन्य परिवारीजनों के साथ मौके पर पहुंचे। उसने बताया कि रामभजन बचपन से ही अलग विचार का था। करीब 22 वर्ष पूर्व भीमसेन के पास कलकपुर गांव में विवाह हुआ था। विवाह के कुछ वर्षों में ही उसकी पत्नी छोड़कर चली गई थी। इसके बाद उसने भी गांव छोड़ दिया था। वह कपासी कला में आकर रहने लगा था।