भगवान राम ने जब माता सीता का परित्याग किया था, तब वह वाल्मीकि आश्रम जाने से पहले मां भगवती के पास प्रार्थना के लिए गईं थीं। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के बेटों लव-कुश की जन्मस्थली बिठूर से महज कुछ दूरी पर स्थित आशा देवी मंदिर माता सीता के प्रार्थना का स्थान हुआ करता था। ऐसी मान्यता है कि सीता ने धरती में समाने से पहले यहां पूजा की थी।
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आशा देवी मंदिर
कानपुर के कल्याणपुर थाने के पास बने आशा देवी मंदिर की अनोखी मान्यता है। यहां भक्त फल या भोग नहीं बल्कि ईंट पत्थर चढ़ाते हैं। लोगों का मानना है कि इससे माता खुश हो जाती हैं और उनकी मुरादें पूरी कर देती हैं। आशा दूज के दिन यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।
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आशा देवी मंदिर
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम ने जब माता सीता का त्याग किया था, तब वह बाल्मीकि आश्रम जाने से पहले यहांं रुककर माँ भगवती की प्रार्थना की थी। सीता माता ने यहां भगवान राम के लिए आश लगाई थी। मंदिर में माता की मूर्ति नहीं बल्कि शिला रखी हुई है, जिसकी पूजा की जाती है। महिलाएं माता की पूजा में ईंट-पत्थर के साथ-साथ पूरेे श्रंगार का सामन चढ़ाती हैंं।
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आशा देवी मंदिर
मंदिर की विशेषता है कि यहां श्रद्धालु खुले में पूजा करते हैंं। कई बार मंदिर में छत ढालने की कोशिश की गई, लेकिन हर बार छत टूटकर गिर जाती थी। कोई भी मौसम हो भक्त यहां खुले में ही माता की पूजा करते हैं।
भक्त गीता श्रीवास्तव की मानें तो मंदिर में माता से आस लगाकर कुछ मांगने से वह एक साल के अंदर पूरी हाे जाता है। उनके अनुसार एक बार उनकी बेटी की तबियत खराब हो गई थी, डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया था। इस मंदिर में आकर ईंट रख कर मन्नत मांगी और बेटी ठीक हो गई।