102 साल पहले दिसंबर महीने की 16 तारीख कानपुर के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी। 16 दिसंबर 1916 ही वह दिन था, जब पहली बार महात्मा गांधी के चरण कानपुर की धरती पर पड़े थे। डाक विभाग इस मौके पर रविवार को महात्मा गांधी पर विशेष आवरण (स्पेशल कवर) का विमोचन करेगा। महात्मा गांधी का 102 साल पहले यहां आने का कोई पूर्व नियोजित कार्यक्रम नहीं था। लखनऊ में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का महाधिवेशन था। इसमें शामिल होने कानपुर से पत्रकार शिरोमणि गणेश शंकर विद्यार्थी भी गए थे। वह यहां से यह बात ठानकर गए थे कि महाधिवेशन की समाप्ति के बाद वह महात्मा गांधी और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को कानपुर लेकर जरूर आएंगे। वह अपने इस संकल्प में सफल रहे।
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16 दिसंबर को दोनों विभूतियां कानपुर पहुंचीं। उस समय लोगों के मन में अंग्रेजों का बहुत खौफ था। इसलिए इन दोनों विभूतियों को कोई भी अपने यहां ठहराने को राजी नहीं हुआ। प्रताप समाचारपत्र में गणेश शंकर विद्यार्थी के सहयोगी रहे दशरथ प्रसाद द्विवेदी ने अपने संस्मरण में लिखा है कि जब महात्मा गांधी और लोकमान्य तिलक को ठहरने का कहीं ठौर नहीं मिला, तो महात्मा गांधी को प्रताप अखबार के दफ्तर में ठहराया गया और लोकमान्य को पुराने रेलवे स्टेशन के पास एक धर्मशाला में। उस समय लोग महात्मा गांधी के व्यक्तित्व से उतने परिचित नहीं थे, जितने कि लोकमान्य के। गुजराती पगड़ी और लंबा कोट पहने महात्मा उस समय मोहनदास करमचंद गांधी ही थे। लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में एक जुलूस निकला था और परेड में सभा हुई थी, लेकिन इस सभा में महात्मा गांधी का भाषण नहीं हुआ था। महात्मा गांधी ने कानपुर की इस पहली यात्रा में कई लोगों से मुलाकात जरूर की थी। वह डॉ. मुरारीलाल रोहतगी से मिलने उनके घर गए थे।
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दूसरी यात्रा में स्वदेशी वस्त्र पहनने के लिए प्रेरित किया
महात्मा गांधी दूसरी बार 21 जनवरी 1920 को इलाहाबाद से लौटते समय कानपुर आए। उन्होंने स्वदेशी वस्त्र भंडार का उद्घाटन किया और लोगों को स्वदेश में निर्मित वस्त्र पहनने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने व्यापारियों को भी संबोधित किया। महात्मा गांधी ने अपने भाषण में कानपुर की तुलना बंबई (अब मुंबई) की औद्योगिक प्रगति से की थी। उन्होंने यह भी कहा था कि कानपुर की जलवायु काफी शुद्ध है।
तीसरी यात्रा में जताई थी चिंता
सन 1920 में ही महात्मा गांधी तीसरी बार कानपुर आए। उन्होंने परेड मैदान में एक जनसभा को संबोधित किया था। इसमें उन्होंने सांप्रदायिक तनाव पर चिंता जताई थी। उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि भ्रम में न आएं। विवेक से काम लें। आपस में विचार-विमर्श करें और मिलजुल कर रहें।
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चौथी यात्रा में अंग्रेजों को ललकारा
चौथी बार 8 अगस्त 1921 को जब महात्मा गांधी कानपुर आए, तो उनके तेवर तीखे थे। उन्होंने मारवाड़ी विद्यालय में पहले तो महिला सशक्तीकरण पर व्याख्यान दिया। फिर अंग्रेजों को ललकारते हुए कहा, अगर अंग्रेजों को भारत में रहना है, तो मालिकों की तरह नहीं, सेवकों की तरह रहना होगा।
पांचवीं बार अधिवेशन में आए
महात्मा गांधी पांचवीं बार कानपुर तब आए, जब दिसंबर सन 1925 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का महाधिवेशन यहां हुआ। उन्होंने इस बार कई सभाएं कीं और लोगों को स्वदेशी उत्पादों के इस्तेमाल के लिए प्रेरित किया।
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छठी यात्रा में दलितों से भेदभाव दूर करने के लिए कहा
महात्मा गांधी छठी बार कानपुर 22 सितंबर 1929 को आए। इस बार उन्होंने जनसभा में लोगों से आह्वान किया कि दलितों के साथ भेदभाव न करें। वह इस बार कानपुर में तीन दिन रुके थे।
सातवीं यात्रा में किया शास्त्रार्थ
महात्मा गांधी अंतिम बार 22 जुलाई 1934 को कानपुर आए। इस बार उन्होंने दलितों को मंदिरों में प्रवेश दिलाने के लिए सनातनियों से शास्त्रार्थ किया। नतीजा यह हुआ कि अधिकांश मंदिरों के द्वार दलितों (हरिजनों) के लिए खुल गए।
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विशेष आवरण आज
महात्मा गांधी के प्रथम कानपुर आगमन के 102 साल पूरे होने पर भारतीय डाक विभाग फिलेटली (डाक टिकट) ब्यूरो कानपुर प्रधान डाकघर 16 दिसंबर को विशेष आवरण (स्पेशल कवर) का विमोचन करेगा। चीफ पोस्टमास्टर मनोज मिश्र ने बताया कि कार्यक्रम का आयोजन प्रधान डाकघर के द्वितीय तल पर स्थित फिलेटली ब्यूरो में सुबह 11 से दोपहर 12 बजे तक होगा।
गणेश शंकर विद्यार्थी
पत्रकार शिरामणि गणेश शंकर विद्यार्थी महात्मा गांधी के बहुत करीबी लोगों में थे। वह प्रताप समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक थे। उन्होंने प्रताप समाचारपत्र के माध्यम से लोगों में नवचेतना जाग्रत की और ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों का विरोध किया। वह क्रांतिकारियों को भी संरक्षण देते थे।
रोहतगी बंधु
डॉ. मुरारीलाल और डॉ. जवाहरलाल रोहतगी भी महात्मा गांधी के बहुत करीबी लोगों में थे। सन 1916 के बाद बापू जब भी कानपुर आते थे, तो डॉ. जवाहरलाल रोहतगी के यहां ही ठहरते थे।
नारायण प्रसाद अरोड़ा
नारायण प्रसाद अरोड़ा कानपुर में कांग्रेस के कर्णधारों में से एक थे। वह कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में थे। वह महात्मा गांधी के करीबी थे। कांग्रेस के आंदोलनों को चलाने में उनकी प्रमुख भूमिका थी। वह समय-समय पर आंदोलनों की स्थिति के बारे में महात्मा गांधी को अवगत कराते थे।