भगवान श्रीकृष्ण ने देवराज इंद्र के घमंड को चूर-चूर कर गोवर्धन पर्वत की पूजा की थी। दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। इस दिन भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा का विधान है। यही नहीं इस दिन 56 या 108 तरह के पकवान बनाकर श्रीकृष्ण को उनका भोग लगाया जाता है। इन पकवानों को 'अन्नकूट' कहा जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान कृष्ण ने देव राज इन्द्र के घमंड को चूर-चूर कर गोवर्धन पर्वत की पूजा की थी।
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गोवर्धन पूजा की कहानी:-
नंद गांव के किसान अपनी फसल क़ा काफी हिस्सा इंद्र देव को खुश करने के लिए उनकी पूजा पर व्यर्थ कर देते थें । एक बार श्रीकृष्ण ने ये सब देख किसानों को इंद्र की पूजा में अनाज व्यर्थ करने से रोक दिया नंद गांव के लोगों ने कृष्ण की बात मानते हुए उस साल इंद्र की पूजा नहीं की जिससे इंद्र देव काफी क्रोधित हुए और अगले वर्ष फसल के समय घनघोर वर्षा शुरू कर दी सभी गांव के लोग कृष्ण के पास भागे-भागे गए और इंद्र के क्रोध क़ा व्रतांत सुनाया तब श्रीकृष्ण ने गांव के सभी जीवों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी एक उंगली से उठाकर गांव के सभी लोगों सहित सभी जानवरों की रक्षा की यह देख इंद्र को लज्जा आई और उन्होंने वर्षा समाप्त कर दी और अपनी गलती स्वीकार की तभी श्रीकृष्ण ने सभी किसानों से कहा की यदि पूजा करनी ही हैं तो इस गोवर्धन पर्वत की पूजा करो जिसने तुम सबकी रक्षा की है। तभी से गोवर्धन पूजा की शुरुआत हुई ।
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गोवर्धन पूजा के दिन गाय-बैलों की पूजा की जाती है। इस पर्व को 'अन्नकूट' के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सभी मौसमी सब्जियों को मिलाकर अन्नकूट तैयार किया जाता है और भगवान को भोग लगाया जाता है। फिर पूरे कुटुंब के लोग साथ में बैठकर भोजन ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि अन्नकूट पर्व मनाने से मनुष्य को लंबी उम्र और आरोग्य की प्राप्ति होती है। यही नहीं ऐसा भी कहा जाता है कि इस पर्व के प्रभाव से दरिद्रता का नाश होता है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। ऐसा माना जाता है कि अगर इस दिन कोई मनुष्य दुखी रहता है तो साल भर दुख उसे घेरे रहते हैं। इसलिए सभी को चाहिए कि वे भगवान श्रीकृष्ण के प्रिय अन्नकूट उत्सव को प्रसन्न मन से मनाएं। इस दिन भगवान कृष्ण को नाना प्रकार के पकवान और पके हुए चावल पर्वताकार में अर्पित किए जाते हैं। इसे छप्पन भोग की संज्ञा भी दी गई है।
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अन्नकूट महोत्सव
दीपावली के अगले दिन गुरुवार को गोवर्धन पूजा की जाती है। इस पूजा की परंपरा श्रीकृष्ण के समय से हो रही है। इस दिन सुबह गाय के गोबर से घर के आंगन में गोवर्धन पर्वत बनाया जाता है। इसके बाद उसे फूल-पत्तों से सजाया जाता है। कहीं-कहीं पर इंद्र और वरुण की भी पूजा की जाती है और कहीं पकवानों का पहाड़ बनाकर उसके बीच में श्रीकृष्ण की मूर्ति रख कर पूजा की जाती है। बृज में इसे मानवाकार रूप में बनाया जाता है। कुछ स्थानों में इसे पर्वताकार रूप में मनाते हैं।
भाई दूज
दीपावली के दो दिन बाद शुक्रवार को 9 नवंबर को भाई दूज है। इस दिन बहनें भाइयों के माथे पर टीका करती हैं और इसके बाद उन्हें मिष्ठान खिलाती हैं। यम द्वितीया के दिन यम की बहन यमुना नदी में स्नान करने से साल भर अकाल मृत्यु की भय से यमराज मुक्त करते हैं।