अपराधी विकास दुबे की चौबेपुर, शिवराजपुर, कल्याणपुर, बिठूर सहित जनपद के सीमावर्ती कई अन्य इलाकों में तूती बोलती थी। कानपुर सदर तहसील से लगने वाली अधिकांश औद्योगिक उद्देश्य वाली बेशकीमती भूमि विकास पंडित के हस्तक्षेप से ही बिकती थीं, यदि लुक-छिप के बैनामा हो भी गया तो कब्जा करने में पार्टी के पसीने छूटते थे और कई बार सीधे विकास का गैंग गोलीबारी भी कर देता था।
यही कारण है कि उक्त इलाकों के अलावा शहर के पॉश इलाकों में विकास दुबे के नाम से व कई बेनामी संपत्तियां हैं और उसके गुर्गे समय-समय पर खरीद-बिक्री कर मोटी कमाई कर अपने आका तक पहुंचा देते थे।
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kanpur encounter
- फोटो : amar ujala
चौबेपुर और शिवराजपुर क्षेत्र में चाहे फैक्टरियां हो या फिर शीतगृह, राइस मिल, छोटे उद्यम, स्कूल-कॉलेज लगाने के लिए जमीन खरीदने वालों को विकास दुबे की हरी झंडी लेना अनिवार्य था। कई बार सहयोग मांग कर यह काम होता था तो कई बार हनक के साथ। इलाके के कई कारखाना-शीतगृहों, उद्यमियों के सूत्रों की माने तो करोड़ों रुपये की जमीन खरीदने के बाद पंडित जी का आशीर्वाद ही फैक्टरी बनाने और उसे चलाने की सबसे बड़ी गारंटी होती थी।
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kanpur encounter
- फोटो : amar ujala
चौबेपुर में आलू का व्यापार करने वाले एक बड़े कारोबारी ने बताया कि एक बार इलाके के एक शीतगृह में विकास के पिता ने आलू भंडारित किया था, निकासी के समय कुछ विवाद होने पर विकास दुबे और उसके गुर्गों ने मिल मालिक पर बम के गोले और रायफलों से हमला बोल दिया था, स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप और बड़ी कीमत चुकाने पर शीतगृह मालिक बच सका था।
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विकास दुबे
- फोटो : अमर उजाला
एक फैक्टरी मालिक द्वारा विकास दुबे को कार देने और बिकरू में कोठी बनवाने की भी बातें हैं। मंधना, बिठूर, कल्याणपुर गूबा गार्डेन सहित कानपुर शहर में कई बेनामी संपत्ति विकास दुबे की हैं, गूबा गार्डेन कल्याणपुर में आज भी उसके कई प्लॉट घेराबंदी कर के पड़े हुए हैं।
वहीं, विकास दुबे के पारिवारिक सदस्यों ने बताया कि वसूली, रंगदारी की बातें गलत हैं। हां वह विवादित भूमि की लेन-देन में जरूर शामिल रहता था और अपने दम पर खरीदने वाली पार्टी को विधि तरीके से कब्जा भी करवाता था।