देश के सबसे सूबे उत्तर प्रदेश की कन्नौज लोकसभा सीट समाजवादी पार्टी के लिए एक लंबे अर्से से सुरक्षित सीट रही है। कभी इसी लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी।
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डिंपल के रोड शो में अखिलेश यादव
- फोटो : अमर उजाला
अखिलेश के बाद इसी लोकसभा सीट से डिंपल यादव ने यूपी की राजनीति में एंट्री मारी थी। 23 साल बाद एक बार फिर से कन्नौज लोकसभा सीट पर भाजपा की एंट्री हुई है।यूपी की इस सीट पर सपा ने हमेशा ऐसा तानाबाना बुना कि दूसरी पार्टियां उसके इस दुर्ग को भेद नहीं पाती थीं।
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अखिलेश यादव
- फोटो : अमर उजाला
इस बार खुद यहां से चुनाव लड़ने की शुरुआती घोषणा के बाद सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बसपा से गठबंधन होने के बाद पत्नी डिंपल यादव को मैदान में उतार दिया था। वह इस सीट को डिंपल के लिए सबसे सुरक्षित मान रहे थे। सपा के इस दुर्ग को भेदना असंभव था लेकिन मोदी के राष्ट्रवाद ने न सिर्फ से भेदा बल्कि बुरी तरह से रौंद कर रख दिया।
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डिंपल यादव, सुब्रत पाठक
अखिलेश यादव के इस्तीफे के बाद 2012 के उपचुनाव में निर्विरोध जीतने वाली डिंपल यादव को यहां 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के सुब्रत पाठक से कड़ी टक्कर मिली थी। इस बार डिंपल यादव और सुब्रत पाठक के बीच कांटे की टक्कर रही।
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अखिलेश यादव, डिंपल यादव, सुब्रत पाठक
कभी सुब्रत आगे तो कभी डिंपल कुछ हजार वोटों के अंतर से आगे रहीं। एक बार सुब्रत पाठक की बढ़त के बाद सपा खेमे में गम की लहर दौड़ गई। देर रात डिंपल यादव ने हार स्वीकार करते हुए एक ट्वीट भी किया था। इस बार सुब्रत ने उन्हें पटखनी देकर एक बार फिर से कन्नौज सीट पर भगवा ध्वज फहराया है।
मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव, अखिलेश यादव व डिंपल यादव
कन्नौज संसदीय सीट पर अब तक 16 चुनाव हो चुके हैं। इनमें दो उपचुनाव भी शामिल हैं। इन चुनावों में सबसे ज्यादा सात बार समाजवादी पार्टी को कामयाबी मिली है। भाजपा यहां सिर्फ एक बार 1996 में जीती थी। बसपा ने इस सीट से कभी जीत का जायका नहीं चखा। इस बार जीतकर भाजपा ने इतिहास रच दिया।