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कभी देखा है ऐसा मंदिर जहां भक्ति संग होता हो सजदा

Fri, 24 Feb 2017 12:51 AM IST
मुकीद अहमद, अमर उजाला, कानपुर

सार

​- डेरापुर क्षेत्र का प्राचीन मंदिर में एक जगह पर मजार व शिवलिंग स्थापित
- शिवरात्रि व सावन को होते हैं धार्मिक कार्यक्रम
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कानपुर देहात के डेरापुर में कपालेश्वर मंदिर
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विस्तार
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कहते हैं इस मदिंर में 'पीर पहलवान बाबा' रहते हैं जो इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत अपने भीतर समेटे हुए हैं। 


 

मंदिर में मजार पर शिवलिंग

डेमो
कानपुर देहात के डेरापुर कस्बे के सेंगुर नदी के तट पर स्थित कपालेश्वर जी महाराज नामक यह मंदिर हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता है। इनके दर्शनार्थ हिंदू और मुस्लिए समुदाय के लोग यहा जमा होते हैं। मंदिर में मजार पर एक शिवलिंग स्थापित है। 

इसलिए इसका नाम पीर पहलवान बाबा पड़ गया। यहां हर शिवरात्रि को जलाभिषेक के लिए भारी तादात में श्रद्धालु आते हैं। कपालेश्वर मंदिर जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।

डेरापुर रूरा मार्ग से करीब सौ मीटर की दूरी पर सेंगुर नदी के किनारे टीले पर कपालेश्वर जी महाराज का मंदिर स्थित है। इसके एक सिरे पर शिवलिंग और नंदी की प्रतिमा स्थापित है। पूर्वजों के अनुसार उक्त मंदिर के अंदर बनी मजार को पीर बाबा के नाम से कब्र के सिरे पर स्थापित शिवलिंग को भगवान शंकर के नाम से जाना जाता है।
 
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जलाभिषेक को आते हैं कांवरिये

डेमो
उक्त कपालेश्वर मंदिर के सरवराकार जमींदार परिवार के पूर्व प्रधान करूणेश नारायण मिश्रा द्वारा रखरखाव किया जाता है। मंदिर में स्थापित मजार व उर्स पर स्थापित शिवलिंग क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम एकता एवं सौहार्द की अनूठी मिसाल पेश करता है। इस मंदिर में स्थापित मजार पर जहां मुस्लिम चादर चढ़ाकर और मन्नतें मानते हैं तो वहीं हिंदू शिवलिंग की पूजा अर्चना करते हैं। किसी भी समुदाय, जाति, धर्म के लोगों को किसी प्रकार से मंदिर में आवाजाही के लिए नहीं रोका जाता।  

जलाभिषेक को आते हैं कांवरिये
डेरापुर। महाशिवरात्रि पर लोधेश्वर जाने वाले कांवरिया भी उक्त मंदिर के दर्शन कर प्रस्थान करते हैं तो वहीं कई लोग तो अब कांवर लेकर भी मंदिर पर शिवरात्रि को जलाभिषेक करने के लिए आने लगे हैं। मंदिर के सरवाकार करूणेश नारायण मिश्रा व उनके पुत्र अंकित मिश्रा ने बताया कि उनके पूर्वजों ने उन्हें जानकारी दी थी कि इस दैव स्थान पर हिंदू मुस्लिम  लंबे अर्से से मनौती करने तथा पूजा अर्चना करने आते रहे हैं, जिन लोगों की मनौती पूरी हो जाती है तो वे लोग पुआ, गुलगुला आदि चढ़ावे के रूप में चढ़ाते रहे ।  

 
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