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इस शख्स को देकर चले गए गोपाल दास नीरज अपना आशियाना, जानिए कैसे थे मुलायम सिंह से उनके रिश्ते

Sat, 21 Jul 2018 11:53 AM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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दिवंगत गोपाल दास नीरज, मुलायम सिंह यादव
गीत विधा के पुरोधा, पद्मश्री गीतकार व हिन्दी काव्य के महानायक गोपाल दास नीरज की दरियादिली का वाक्या याद कर लोगों की आंखों में आंसू आ गए। जाने से कुछ समय पहले वे अपने सेवक को पुश्तैनी आशियाना देकर चले गए। इस मकान से उनकी वर्षों पुरानी यादें जुड़ी थीं। नीरज जब भी इटावा आते थे तो अपने इकदिल के पुराने मकान में जरूर रुकते थे, जहां पर वह उनकी सेवा करता था। महाकवि के जाने के बाद मकान की देखभाल की जिम्मेदारी भी उसकी रहती थी।


इकदिल में रहने वाले ज्वाला शरण सक्सेना और सुनील टंडन ने बताया कि महेवा ब्लाक के पुरावली गांव में रहने के वाले बाबू बृज किशोर सक्सेना के बेटे महान साहित्यकार व गीताकार गोपालदास नीरज का परिवार 1931 में यहां आया था।

उस समय नीरज की उम्र छह साल की थी और उनके पिता का निधन हो चुका था। चार भाई नारायण दास, कृष्ण दास, गोपालदास और दामोदर वे तीसरे नंबर के थे। गोपालदास नीरज की शिक्षा सनातम धर्म कॉलेज में हुई। वे बचपन से साहित्य के शौकीन और कविताएं लिखते थे। उसके बाद वह फिल्मों में गीत लिखने लगे। 

  
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दिवंगत कवि गोपाल दास नीरज की पुरानी तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
1985 के बाद से गोपाल दास नीरज का परिवार भी इटावा के इकदिल से दूर होता चला गया। गोपाल दास नीरज सबसे पहले आगरा और फिर अलीगढ़ में रहने लगे। लेकिन गोपालदास नीरज का इकदिल से नाता नहीं टूटा। वे जब भी इटावा आते अपने पुराने मकान में रुकते थे। उनकी सेवा बिहारी नाम का युवक करता था। वह टाउन एरिया में चपरासी है।

गोपाल दास जी अपना पुश्तैनी मकान उसी को देकर चले गए हैं। हालांकि उन्होंने उसके नाम से रजिस्ट्री नहीं की है। लेकिन उन्होंने बिहारी के लिए सर्वजनिक ऐलान कर मकान दे दिया। उनकी दरियादिली पर परिवार के लोगों ने सहमति जताई। उसके बाद से मकान पर कोई नहीं आया। 
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दादा नेम सिंह ने नीरज के बारे में बताई ये बातें
नारायण स्वामी चाय की दुकान आए बिना पूरी नहीं होती थी इटावा की यात्रा 
इटावा सेवा निधि ने उनके 75वें वर्ष को हीरक जयंती के रूप में मनाया और उनका सम्मान किया। जीवन के शुरुआती दिनों में उन्होंने इटावा कचहरी में टाइपिस्ट का काम किया। एटा से हाईस्कूल, कानपुर से इंटरमीडिएट, बीए, एमए करने के बाद डीएवी कानपुर में क्लर्क रहे। इसके बाद मेरठ में प्राध्यापक और अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में प्राध्यापक बन गए। 


नीरज जी के काव्य संकलन हिन्दी वाणी का वर्ष 2004 में संपादन करने वाले जनपद के विख्यात साहित्यकार डा. कुश चतुर्वेदी ने बताया कि नीरज के उनसे आत्मीय संबंध रहे। बकौल कुश चतुर्वेदी नीरज जी में इटावा की अक्खड़ता सदैव बनी रही। नीरज जी इटावा शहर के राजागंज स्थित नारायण स्वामी चाय की दुकान पर आकर साहित्यकारों के साथ बैठना नहीं भूलते थे, यहां आए बिना उनकी इटावा की यात्रा पूरी नहीं होती थी। वे रिक्शे पर इटावा में भ्रमण करते थे। 

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दिवंगत गोपाल दास नीरज की पुरानी तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
गीत विधा का शीर्षस्थ हस्ताक्षर थे 
पूर्व प्राचार्य केकेडीसी डा. विद्याकांत तिवारी ने बताया कि गोपालदास नीरज उत्तर छायावाद से आधुनिक हिंदी काव्य के सरताज थे और हरिवंश राय बच्चन के समकालीन गीत परंपरा के बेताज बादशाह थे। मंचीय कविता के महारथी नीरज उच्च स्तरीय कविता करते थे। उनकी कविता में इतनी क्षमता थी कि यदि वे मंच से न जुड़े होते तो विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में होते। उनके जाने के बाद उनका सही मूल्यांकन हिन्दी के विद्यार्थी कर पाएंगे, जो उनके जीते जी न हो पाया। गीत विधा का शीर्ष हस्ताक्षर हमारे बीच नहीं रहा, यह हिन्दी व हम सभी के लिए यह अपूर्णनीय क्षति है। 

दो साल पहले आकर मिले थे इकदिल बस्ती कि लोगों से 
 गोपाल दास नीरज ने साहित्य की ऊंचाइयों को छुआ हो लेकर उनका लगाव अपनी बस्ती के लोगों से हमेशा रहा। कार्यक्रमों में व्यस्त रहने के बाद भी वह साल में एक दो बार इकदिल आकर लोगों से मिले थे और साहित्य पर चर्चा करते थे। उनके निधन की खबर जैसे ही बस्ती के लोगों को लगी तो पूरे कस्बे में शोक की लहर दौड़ गई। लोगों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया  है। 
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दिवंगत गोपाल दास नीरज
मुलायम सिंह के करीबी थे गोपालदास नीरज। 2004 की मुलायम सरकार ने उनको हिन्दी साहित्य संस्थान का चेयरमैन बनाया था,  जोकि 2007 तक रहे। उन्होंने अपने कार्यकाल में हिन्दी साहित्य को बढ़ाने का प्रयास किया। 

सैफई महोत्सव व नुमाइश मैदान में गोपालदास नीरज का जलवा रहता था। उनकी रचनाओं को सुनने के लिए श्रोताओं का जन सैलाब उमड़ता था। सपा के पूर्व राज्यमंत्री रामसेवक गंगापुरा ने बताया कि गोपालदास नीरज के निधन से इटावा ही नहीं पूरे देश को बड़ी हानि हुई है।


उन्होंने बताया कि कानपुर के डीएवी कॉलेज से हिन्दी विषय में एमए किया। उसके बाद धर्म समाज डिग्री कॉलेज अलीगढ़ में हिन्दी के प्रवक्ता रहे। दस साल नौकरी करने के बाद वह फिल्म जगत में चले गए।
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