बादल फटने और भूस्खलन की यह आपबीती और आंखों देखी घटना है, जिसे याद कर कानपुर के रतन ऑर्बिट, इंदिरानगर की रहने वाली अश्रिता शुक्ला, उनके पति मोहम्मद फहद, बिजनेसमैन पिता उमेश शुक्ला और मां अंजना शुक्ला सिहर उठती हैं।
अमर उजाला संवाददाता ने रविवार को जब उनसे बात की तो लगा जैसे पहाड़ी गांव की अंधेरी रात का वह खौफनाक मंजर उनकी आंखों के सामने तैर रहा हो। अश्रिता बताती हैं कि 17 जून को हम लोगों ने निकलने की कोशिश की। बोलेरो किराये पर ले रखी थी।
जब निकले तो देखते हैं कि रास्ता गायब है। वाहन वहीं छोड़ दिया। सेना के जवान लोगों को रेस्क्यू करते रहे। अस्थायी पुल बना दिया। लोगों को बचाकर गांव तक पहुंचाया। अश्रिता रेंजिंग और उनके गांवों वालों की तारीफ करते नहीं थकतीं। बताती हैं कि सेना ने तो लोगों के खाने-पीने का इंतजाम किया। इसके अलावा गांववाले भी पर्यटकों के खाने-पीने का इंतजाम करते रहे।
अब तो अधिकांश लोग कैश के बजाय एटीएम कार्ड लेकर चलते हैं। आपदा में फंसे लोगों के पास पैसा भी नहीं था। गांववालों ने किसी मेहमान से पैसा नहीं मांगा, जो दे दिया रख लिया। उनका बहुत अच्छा बर्ताव रहा है। हम सुरक्षित आ गए, लेकिन अब भी वह दृश्य जब जेहन में कौंधता है तो सिहर जाते हैं।