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शायद आपको ताज्जुब हो पर श्रीलंका में ऐसा ही है, बच्चों को ये अधिकार नहीं

Sat, 11 Aug 2018 03:10 PM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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शिक्षिका स्नामली बंद्रा और लालाइनी पाइरिस - फोटो : अमर उजाला
यूपी के कानपुर महानगर में एलन हाउस स्कूल में चल रहे अंतर्राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव एरूदी में श्रीलंका के विद्यार्थ स्कूल से आई शिक्षिका स्नामली बंद्रा और लालाइनी पाइरिस ने भारत और श्रीलंका के एजूकेशन सिस्टम पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के एजूकेशन सिस्टम में काफी अंतर है। इस दौरान उन्होने कुछ ऐसी जानकारियां दीं जो शायद ही आपको पता हों। जानिए कुछ विशेष बातें...


 
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डेमो पिक
श्रीलंका के विद्यार्थ स्कूल से आई शिक्षिका स्नामली ने कहा कि यहां बच्चों की प्रतिभाओं को निखारने का मौका दिया जाता है। श्रीलंका में ऐसा नहीं है। कुछ प्राइवेट स्कूल जरूर ऐसी कोशिश करते हैं, लेकिन सरकारी स्तर पर बिल्कुल नहीं होता है।
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उन्होने कहा कि यहां आकर काफी अच्छा लगा और बहुत कुछ सीखने को मिला। पूरा महोत्सव बच्चों ने आयोजित किया है, यह सुनकर बहुत ताज्जुब हुआ और अच्छा भी लगा। स्नामली ने बताया कि श्रीलंका में को-एड एजूकेशन का कल्चर भी कम है। छात्र और छात्राओं के स्कूल अलग-अलग हैं। इसलिए हमारे साथ आने वाले छात्र बहुत नर्वस भी थे।
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शिक्षिका स्नामली बंद्रा और लालाइनी पाइरिस - फोटो : अमर उजाला
शिक्षिका स्नामली बंद्रा और लालाइनी पाइरिस ने कहा कि श्रीलंका में बच्चों को विषय चुनने का अधिकार नहीं है। वहां क्लास के आधार पर विषय निर्धारित होते हैं। स्नामली ने बताया कि भारत और श्रीलंका के खाने में भी काफी अंतर है। वहां नारियल के तेल का इस्तेमाल होता है। रोटियां के बजाय चावल खाया जाता है। उन्होने कहा कि यहां आकर बच्चों के मन में भी उत्साह दिखा।
 
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