भारत त्यौहारों का देश है। यहां हर त्यौहार को बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। हम में से बहुत से लोग त्यौहार मनाते तो जरूर हैं लेकिन इनको मानाने के पीछे की वजह नहीं जानते। दीपावली के दिन काफी करीब हैं लेकिन दीपावली की शुरुआत होती है धनतेरस से। धनतेरस कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी यानी दीपावली से दो दिन पहले आता है। इस दिन लोग अपने घर के दरवाजे के पास दीया जलाते हैं और नया बर्तन या चांदी खरीदते हैं।
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जानिए क्यों मनाया जाता है धनतेरस
शास्त्रों के अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन समुद्र मंथन के दौरान चिकित्सा विज्ञान के देवता भगवान धनवंतरी प्रकट हुए थे। धनत्रयोदशी के दिन भगवान धनवंतरी का जन्म हुआ था और इसीलिए इस दिन को धनतेरस के रूप में पूजा जाता है।
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दीपावली के दो दिन पहले आने वाले इस त्यौहार को लोग काफी धूमधाम से मनाते हैं । इस दिन गहनों और बर्तनों की खरीदारी जरूर की जाती है ।
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शुभ होता है पीतल और चांदी के बर्तन खरीदना
भगवान धनवंतरी को नारायण भगवान विष्णु का ही एक रूप माना जाता है। इनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें से दो भुजाओं में वे शंख और चक्र धारण किए हुए हैं। दूसरी दो भुजाओं में औषधि के साथ वे अमृत कलश लिए हुए हैं।
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ऐसा माना जाता है कि यह अमृत कलश पीतल का बना हुआ है क्योंकि पीतल भगवान धनवंतरी की प्रिय धातु है इसलिए इस दिन पीतल का बर्तन या चांदी खरीदना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई कोई भी वस्तु शुभ फल प्रदान करती है और लंबे समय तक चलती है लेकिन अगर भगवान की प्रिय वस्तु पीतल की खरीदारी की जाए तो इसका तेरह गुना अधिक लाभ मिलता है।
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धनतेरस पर दीपक जलाने का महत्व
धनतेरस के दिन घर के मुख्य द्वार पर एक दीया जलाने की मान्यता है। प्राचीन समय में हेम नाम का एक राजा रहता था। विवाह के कई सालों बाद उसकी एक संतान हुई। जब ज्योतिषियों से राजा ने पूछा तो पता चला की राजकुमार के विवाह के ठीक चार दिन बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी।
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यह बात जानकार राजा और रानी बहुत दुखी हो गए। धीरे-धीरे समय बीतता गया और राजकुमार ने गन्धर्व विवाह कर लिया।
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विवाह के चार दिन बाद यमदूत राजकुमार के प्राण लेकर चले गए लेकिन राजकुमार की पत्नी के शोक विलाप को देखकर उन्होंने यमराज से पूछा की कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे इंसानों की अकाल मृत्यु न हो सके।
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यमराज ने इसका उपाय बताते हुए कहा की कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी की रात को जो मनुष्य दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाएगा वो अकाल मृत्यु से बच सकता है। तभी से धनतेरस के दिन दीया जलाने की परम्परा की शुरुआत हुई।
शाम 6.05 बजे से शाम 8.01 बजे तक
अवधि- 1 घंटा 55 मिनट
प्रदोष काल- शाम 5.29 से रात 8.07 बजे तक
वृषभ काल- शाम 6.05 बजे से रात 8.01 बजे तक
त्रयोदशी तिथि आरंभ- 5 नवंबर, सुबह 01.24 बजे से
त्रयोदशी तिथि खत्म- 5 नवंबर, रात्री 11.46 बजे