भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में बसा है इत्र की राजधानी कहा जाने वाला कन्नौज जिला। इत्र की कहानी बहुत पुरानी है। इत्र के बारे में मुगल बादशाह जहांगीर का कहना था, 'यह टूटे दिलों को जोड़ता है और सुकून देता है'। माना जाता है कि एक जमाने में कन्नौज की नालियों से भी इत्र की खुशबू आती थी। लेकिन पिछले कुछ समय से इत्र की सुगंध कन्नौज से लुप्त होती जा रही है। आज हम आपको बताएंगे कि ऐसे कौन से कारण हैं जिनके चलते कन्नौज का इत्र व्यापार पिछड़ता जा रहा है।
आगे की स्लाइड में पढ़ें- ऐसे बनता है कन्नौज का इत्र...
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प्राची ऐरोमेटिक्स के संचालक नितिन जैन बताते हैं कि गुलाब, चंदन और केवड़े आदि इत्रों की महक को बिना किसी आधुनिक और कृत्रिम तरीके से निकाला जाता है। फूलों की कलियों को पानी में मिलाकर तांबे के बर्तन में गरम करते हैं, इससे निकलने वाली सुगंधित भाप को बांस के पाइप से निकाल कर चंदन के तेल से पास कराया जाता है जो इत्र का आधार होता है। इत्रों को बनाने में लगभग 15 दिन का समय लग जाता है।
आगे की स्लाइड में पढ़ें- इन जगहों पर होती है इत्र की सप्लाई...
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कन्नौज के इत्र का व्यापार पूरे भारत में फैला हुआ है। यूके, यूएसए, सउदी अरब, इरान, इराक, ओमान आदि जगहों पर भी इत्रों का निर्यात होता है। लेकिन आज बाजार में परफ्यूम्स और डियोड्रेंट्स की मांग बढ़ने से इत्र का कारोबार गिरता जा रहा है।
आगे की स्लाइड में पढ़़ें- कैसे होता है इत्र का इस्तेमाल...
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कन्नौज में इत्र बनाने की करीब 200 से ज्यादा फैक्ट्रियां हैं। इत्र का प्रयोग पूजा, खान-पान, इलाज और खास मेहमानों के स्वागत में होता था लेकिन अब इसे गुटखे, जर्दा, कॉस्मेटिक्स और पान मसाले में सुगन्ध के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। पारंपरिक इत्र के उत्पादन में उच्च लागत के कारण कन्नौज में इत्र तेजी से हार रहा है वहीं रसायनिक विकल्प और पैराफीन आधारित परफ्यूम्स को बनाना सस्ता पड़ता है। कन्नौज के इत्र के दाम की शुरुआत जहां हजारों से होती है वहीं एल्कोहल निर्मित डियोड्रेंट्स इनसे काफी सस्ते मिलते हैं। कम कीमत होने से डियो युवाओं में प्रचलित हो चुका है और इत्र अपनी पहचान खोता जा रहा है। आगे की स्लाइड में पढ़ें- चंदन की लकड़ी ने लगाई करोबार पर सेंध...
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मौजूदा समय में इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ी दिक्कत चंदन की लकड़ी को लेकर हो रही है। सरकार ने चंदन की लकड़ी के इस्तेमाल और एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। चंदन ऑयल का इस्तेमाल इत्र बनाने में किया जाता है। चंदन का ऑयल इत्र के कोर में होता है, इसकी खासियत है कि इसे जिस इत्र में मिलाया जाता है यह और खुशबूदार बना देता है। आगे की स्लाइड में पढ़ें- ये है सबसे महंगा इत्र...
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सबसे कीमती इत्र अदरऊद है, जिसे असम की विशेष लकड़ी आसामकीट से बनाया जाता है। बाजार में इसकी कीमत 50 लाख रुपये प्रति किलो है। इत्र कारोबारी बताते हैं कि असम में लड़की के ऊपर जो फंगस लग जाती है, उस लकड़ी को काटकर उसे इस्तेमाल कर यह इत्र तैयार होता है, यह 5000 रुपये प्रति ग्राम में मिलता है। आगे की स्लाइड में पढ़ें- 50 फीसदी तक गिरी इत्र की डिमांड...
इत्र कारोबारी बताते हैं कि तंबाकू और गुटखा उद्योग में स्वाद बढ़ाने के लिए इत्र का इस्तेमाल हो रहा है। गुटखे पर प्रतिबंध लगने के कारण प्राकृतिक रूप से बनाए जाने वाले इत्र की मांग 50 फीसदी तक गिर गई है।