चैत्र नवरात्र आज से प्रारम्भ हो गए हैं और 14 अप्रैल रविवार को समाप्त होंगे। आदिशक्ति को प्रसन्न करने का यही सबसे उत्तम समय माना गया है। देवी आराधना का पर्व नवरात्र साल में दो बार मनाई जाता है। पहला चैत्र और दूसरा शारदीय नवरात्र। नौ दिनों तक शक्ति की उपासना देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों के रूप में की जाती है।
बलभद्र पीठाधीश्वर आचार्य विष्णु महाराज बता रहे हैं चैत्र नवरात्र से जुड़ी पूर्ण जानकारी...
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नवरात्र (फाइल फोटो)
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नवरात्र घट स्थापना विधि, शुभ मुहूर्त और इससे जुड़ी खास बातें
- नवरात्र के पहले दिन घट स्थापना होती है, फिर नौ दिनों तक देवी के नौ रूपों की विशेष पूजा और आराधना होती है।
- कलश स्थापना कर नवरात्र पर समस्त दैवीय शक्तियों का आह्रान कर उन्हें सक्रिय किया जाता है।
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नवरात्र (फाइल फोटो)
- नवरात्र पर कलश स्थापना का विशेष महत्व होता है। कलश स्थापना करते ही नवरात्र का पवित्र पर्व शुरू हो जाता है। घटस्थापना करते समय मिट्टी में जौ (यव) बोए जाते हैं। इसके बाद गंगाजल, चंदन, फूल, दूर्वा, अक्षत, सुपारी और सिक्के कलश में रखें। कलश स्थापना के लिए एक लकड़ी का पाटा लें और उस पर नया लाल कपड़ा बिछाएं। इसके बाद नारियल और कलश पर मौली बांधे, रोली से कलश पर स्वास्तिक बनाएं। वहीं कलश में शुद्ध जल और गंगा जल रखें।
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नवरात्र (फाइल फोटो)
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- इस बार चैत्र नवरात्र के आठवें दिन अष्टमी और नवमी एक साथ मनाई जाएंगी। 14 अप्रैल को राम नवमी पर इस बार पुष्य नक्षत्र योग का संयोग बन रहा है। भगवान राम का जन्म भी पुष्य नक्षत्र में ही हुआ था।
- चैत्र नवरात्र अष्टमी के दिन ही सुबह 8 बजकर 19 मिनट को नवमी तिथि प्रारंभ होगी, जो अगले दिन सुबह 6 बजकर 4 मिनट तक रहेगी। भगवान राम का जन्म पुष्य नक्षत्र में दोपहर को हुआ था इसलिए राम नवमी अष्टमी के दिन मनाना शुभ रहेगा।
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नवरात्र (फाइल फोटो)
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- चैत्र नवरात्र के शुभारंभ पर गुड़ी पड़वा और नव संवत्सर 2076 शुरू होगा। इस बार चैत्र नवरात्र रेवती नक्षत्र के साथ शुरू हो रही है। 7- 9 दिनों के इस चैत्र नवरात्र में पांच बार सर्वार्थ सिद्धि और दो बार रवियोग आएगा। जो ज्योतिष दृष्टि से बहुत ही शुभ माना गया है।
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नवरात्र (फाइल फोटो)
चैत्र नवरात्रि कार्यक्रम
6 अप्रैल शनिवार को प्रतिपदा
7 अप्रैल रविवार को द्वितीया
8 अप्रैल सोमवार को तृतीया
9 अप्रैल मंगलवर को चतुर्थी
10 अप्रैल बुधवार को पंचमी
11 अप्रैल गुरुवार को षष्ठी
12 अप्रैल शुक्रवार को सप्तमी
13 अप्रैल शनिवार को अष्टमी
14 अप्रैल रविवार को नवमी व दशमी
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नवरात्र (फाइल फोटो)
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बिना कन्या पूजन अधूरे हैं नवरात्र के सभी व्रत और अनुष्ठान
नवरात्र के दौरान कन्या पूजन का विशेष महत्व है। यदि कोई सच्चे मन से देवी मां की आराधना करते हुए कन्याओं का पूजन करता है तो उसकी सभी मनोकामनाएं बहुत जल्द पूरी होती हैं। जिस तरह बिना कलश पूजन के नवरात्र के सभी व्रत और अनुष्ठान अधूरे हैं उसी प्रकार कन्या पूजन करना आवश्यक है। कम ही लोगों को कन्या पूजन की सही विधि, कन्या पूजन के लाभ व इससे जुड़ी विशेष बातें पता होती हैं। ज्योतिषाचार्य डॉ. नरेंद्र दीक्षित बता रहे हैं कि कन्या पूजन के दौरान किन सावधानियों को बरतना चाहिए जिससे धन-धान्य की प्राप्ति हो...
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नवरात्र (फाइल फोटो)
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कन्या पूजन से फल की प्राप्ति
- एक कन्या की पूजा से ऐश्वर्य
- दो की पूजा से भोग और मोक्ष
- तीन की अर्चना से धर्म, अर्थ व काम
- चार की पूजा से राज्यपद
- पांच की पूजा से विद्या
- छ: की पूजा से छ: प्रकार की सिद्धि
- सात की पूजा से राज्य
- आठ की पूजा से संपदा
- नौ की पूजा से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति।
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कन्या पूजन (फाइल फोटो)
कन्या पूजन की मान्यता
माता के भक्त पंडित श्रीधर के कोई संतान नहीं थी। उन्होंने नवरात्र के बाद नौ कन्याओं को पूजन के लिए घर पर बुलवाया। मां दुर्गा उन्हीं कन्याओं के बीच बालरूप धारण कर बैठ गई। बालरूप में आईं मां श्रीधर से बोली सभी को भंडारे का निमंत्रण दे दो। श्रीधर से बालरूप कन्या की बात मानकर आस-पास के गांवों में भंडारे का निमंत्रण दे दिया। इसके बाद उन्हें संतान सुख मिला।
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कन्या पूजन (फाइल फोटो)
कन्या पूजन के तीन विधानों को भी जानें
प्रथम प्रकार- प्रतिदिन एक कन्या का पूजन अर्थात नौ दिनों में नौ कन्याओं का पूजन करें। इस पूजन को करने से कल्याण और सौभाग्य प्राप्ति होती है |
दूसरा प्रकार- प्रतिदिन दिवस के अनुसार संख्या अर्थात प्रथम दिन एक, द्वितीय दिन दो, तीसरे दिन तीन कन्याओं का पूजन करें। इस प्रकार कन्या पूजन से 45 कन्याओं का पूजन होगा। जिससे सुख व ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है |
तीसरा प्रकार – नौ कन्या का नौ दिनों तक पूजन अर्थात नौ दिनों में 81 कन्याओं का पूजन। इस प्रकार से पूजन से पद, प्रतिष्ठा और भूमि की प्राप्ति होती है |
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कन्या पूजन का फल
- एक वर्ष की कन्या का पूजन नहीं करना चाहिए
- दो वर्ष की कन्या पूजन से दुःख-दरिद्रता और शत्रु नाश
- तीन वर्ष की कन्या पूजन से धर्म-काम की प्राप्ति, आयु वृद्धि
- चार वर्ष की कन्या पूजन से धन-धान्य और सुखों की वृद्धि
- पांच वर्ष की कन्या पूजन से आरोग्यता-सम्मान प्राप्ति
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नवरात्र (फाइल फोटो)
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- छह वर्ष की कन्या पूजन से विद्या व प्रतियोगिता में सफलता
- सात वर्ष की कन्या पूजन से मुकदमा और शत्रु पर विजय
- आठ वर्ष की कन्या पूजन से राज्य व राजकीय सुख प्राप्ति
- नौ वर्ष की कन्या पूजन से शत्रुओं पर विजय, दुर्भाग्य नाश
- दस वर्ष की कन्या पूजन से सौभाग्य और मनोकामना पूर्ति
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ये है कन्या पूजन की विधि
- स्नान करने के पश्चात् कन्याओं के लिए भोजन अर्थात पूरी, हलवा, खीर, चने आदि को तैयार कर लेना चाहिए।
- कन्याओं के पूजन के साथ बटुक पूजन का भी महत्त्व है, दो बालकों को भी साथ में पूजना चाहिए। एक गणेश जी के निमित्य और दूसरे बटुक भैरो के निमित्य कहीं कहीं पर तीन बटुकों का भी पूजन लोग करते हैं और तीसरा स्वरुप हनुमान जी का मानते हैं।
- कन्या पूजन बिना बटुक पूजन के अधूरी होती है।
- कन्याओं को माता का स्वरुप समझ कर पूरी भक्ति-भाव से कन्याओं के हाथ पैर धुला कर उनको साफ़ सुथरे स्थान पर बैठाएं।
- सभी कन्याओं के मस्तक पर तिलक लगाएं, लाल पुष्प चढ़ाएं, माला पहनाएं, चुनरी अर्पित करें उसके बाद ही भोजन कराएं।
- भोजन में मीठा अवश्य हो, इस बात का ध्यान रखें।
- भोजन के बाद कन्याओं के विधिवत कुंकुम से तिलक करें तथा दक्षिणा देकर हाथ में पुष्प लेकर यह प्रार्थना करें।
- वह पुष्प कुमारी के चरणों में अर्पण कर उन्हें ससम्मान विदा करें।