कानपुर में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में भड़की हिंसा को और हवा न दी जा सके, इसे ध्यान में रखते हुए शहर में चार दिन इंटरनेट सेवाएं ठप रहीं। जिससे लोग तो परेशान हुए ही, साथ ही ऑनलाइन लेनदेन नहीं हो सका। इससे कारोबार भी प्रभावित हुआ। जबकि टेलीकॉम कंपनियों के पास यह विकल्प था कि केवल फेसबुक, ट्विटर, इंस्ट्राग्राम जैसी सोशल साइट्स और व्हाट्सएप को ब्लॉक करके काम चलाया जा सकता था।
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कानपुर में हिंसा
- फोटो : अमर उजाला
साइबर एक्सपर्ट राहुल मिश्रा का कहना है कि माहौल बिगाड़ने वाले संदेशों का आदान-प्रदान फेसबुक, ट्विटर, मैसेंजर, इंस्ट्राग्राम, व्हाट्सएप आदि पर ज्यादा होता है। टेलीकॉम कंपनियों केपास यह विकल्प होता है कि वह जिस साइट को चाहें अपने नेटवर्क पर बंद कर सकती हैं। लिहाजा, पूरी तरह से इंटरनेट बंद करने के बजाय इनको बंद करके काम चलाया जा सकता था। न तो इस बारे में अफसरों ने सोचा, न टेलीकॉम कंपनियों ने।
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इंटरनेट सेवाएं रोकने में यूपी तीसरा प्रदेश
कानून व्यवस्था पर मंडराते खतरे को देखते हुए बीते पांच साल में देशभर में 375 बार इंटरनेट सेवाएं बंद की गईं। कश्मीर में 278, राजस्थान में 65 और यूपी में 32 बार नेटबंदी का दौर चला। 2014 में कश्मीर में 55, राजस्थान में 12 और यूपी में 10 बार सेवाएं ठप करनी पड़ीं। 2015 में पूरे देश के अलग-अलग शहरों में 134 बार इंटरनेट बंद करना पड़ा। इसमें सबसे कम आंकड़ा दक्षिण भारत का था। आंध्र प्रदेश, गुजरात और अरुणाचल प्रदेश में केवल एक-एक बार इंटरनेट सेवाएं रोकी गईं थीं।
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घर से लेकर बाजार तक परेशान रहे लोग
20 से 23 दिसंबर की रात तक शहर में इंटरनेट सेवाएं बंद रहीं। इस वजह से लोग बहुत परेशान रहे। ऑनलाइन लेनदेन नहीं हो सका। करोड़ों रुपये का कारोबार प्रभावित हो गया।
पुलिस का एप भी नहीं चल पाया
पुलिस ने अपनी तमाम सेवाएं ऑनलाइन कर दी हैं। कंट्रोल रूम का नंबर काम न करने की स्थिति में पुलिस से सहायता यूपी कॉप एप की मदद से ली जा सकती है। इस पर साइबर ठगी, गुमशुदगी जैसे मामलों में घर बैठे ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। नेटबंदी के दौरान लोग इसका भी इस्तेमाल नहीं कर पाए।