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‘बुलबुल का दंगल’, जानें क्या है इसका धार्मिक महत्व

Sun, 15 Jan 2017 02:47 PM IST
मनोज चौरसिया, अमर उजाला, कानपुर
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बुलबुल दंगल का महत्व - फोटो : अमर उजाला
मकर संक्रांति पर बुलबुलों की लड़ाई केवल मनोरंजन मात्र नहीं है। हिन्दू धर्म में ‘बुलबुल दंगल’ का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि इस लड़ाई की शुरुआत भगवान विष्णु के समय हुई थी। हिन्दू धर्म के अनुसार विष्णु परमेश्वर के तीन मुख्य रूपों में से एक रूप हैं। पुराणों में त्रिमूर्ति विष्णु को विश्व का पालनहार कहा गया है। बुलबुल की लड़ाई सदियों पुरानी प्रथा है और भगवान विष्णु की पूजा बुलबुल की लड़ाई से शुरू होती है।
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खिचड़ी खिलाकर छोड़ दिया जाता है

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कानपुर में बुलबुल दंगल
कानपुर में मकरसंक्रांति पर रामबाग सहित चार स्थानों पर बुलबुल का दंगल हुआ। इसमें दो सौ से ज्यादा लोग अपनी-अपनी बुलबुल लेकर पहुंचे। घंटों चले दंगल के बाद बुलबुलों को खिचड़ी खिलाकर छोड़ा गया। रामबाग में वर्षों से बुलबुलों का दंगल करा रहे विजय जायसवाल के अनुसार बुलबुल के दंगल के तमाम शौकीन कार्तिक पूर्णिमा को बुलबुल पालते हैं। उन्हें खिलाकर दंगल के लिए तैयार किया जाता है। मकरसंक्रांति पर इन्हें लड़ाया जाता है। इसके बाद इन्हें खिचड़ी खिलाकर छोड़ दिया जाता है। परमट में कालीचरन, चमनगंज में कल्लू पहलवान, बेकनगंज में कल्लू बनारसी बुलबुलों ने दंगल कराया।
 
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कार्तिक पूर्णिमा के दिन इन्हें पकड़ा जाता है

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कानपुर में बुलबुल दंगल - फोटो : अमर उजाला
मान्यताओं के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन बुलबुलों को पकड़ा जाता है। इसके बाद इन्हें पाल जाता है और खिला-पिलाकर ताकतवर बनाया जाता है। ऐसा करने से घर में खुशहाली आती है। मकर संक्रांति के दिन ‘बुलबुल दंगल’ खत्म होने के बाद खिचड़ी खिलाकर आसमान में खुला छोड़ दिया जाता है। 
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असम में बुलबुल की लड़ाई पर पाबंदी

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बुलबुल दंगल का महत्व
हाई कोर्ट ने असम के हाजो में हयागरीब माधब मंदिर में बुलबुल पक्षी की पारपंरिक लड़ाई पर पिछले साल प्रतिबंध लगा दिया था। इस आदेश पर हाजो और असम के अन्य भागों के मंदिरों के पुजारियों ने प्रतिक्रिया देते हुए दावा किया था कि पक्षियों की लड़ाई धार्मिक परंपरा का हिस्सा है जिसमें इसके साथ भगवान विष्णु को सम्मान दिया जाता है।  
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