एशियन गेम्स खेलने वाली कानपुर शहर की पहली हैंडबॉल खिलाड़ी ज्योति शुक्ला का कहना है कि मेडल लाना आसान नहीं है तो असंभव भी नहीं है। अमर उजाला से खास बातचीत में उन्होंने बताया कि अन्य खेलों की तरह यदि हैंडबॉल को भी सरकार प्रोत्साहन दे तो महिला खिलाड़ी भी इसमें अपने देश के लिए सोना-चांदी ला सकती है।
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ज्योति शुक्ला
जकार्ता में चल रहे एशियन गेम्स में भारतीय हैंडबॉल टीम का प्रतिनिधित्व कर रहीं ज्योति ने बताया कि अशोक नगर स्थित पूर्णा देवी गर्ल्स इंटर कॉलेज में कक्षा छह में वह खो-खो की खिलाड़ी थीं। इस दौरान ग्रीनपार्क के हैंडबॉल प्रशिक्षक अतुल मिश्रा से उनकी मुलाकात कॉलेज की ही शिक्षिका रमाकांती ने करवाई थी। अतुल ने ही उन्हें हैंडबॉल खेलने के लिए प्रेरित किया।
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ज्योति शुक्ला
बताया कि कॉलेज और कानपुर हैंडबॉल एसोसिएशन से सहयोग मिलने के कारण उनका शुरुआती सफर काफी अच्छा रहा। लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने से आगे बढ़ने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। ज्योति ने बताया कि आज मैं जहां तक पहुंची हूं, इसका पूरा श्रेय मेरे कोच अतुल मिश्रा, सांई हॉस्टल के कोच आसिफ खान व सबसे बड़ा श्रेय रजत दीक्षित को जाता है।
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ज्योति शुक्ला
रजत सर ने हमेशा रीढ़ की हड्डी बनकर मेरा सहयोग किया। साथ ही मां मीरा देवी ने मेरे आत्मबल को कभी कम नहीं होने दिया। उन्होंने बताया कि लड़की होने के बावजूद मुझे हमेशा लोगों का सहयोग मिला।
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एशियन गेम्स खेलने वाली शहर की पहली खिलाड़ी ज्योति शुक्ला की कहानी
मेडल लाना है लक्ष्य
ज्योति ने बताया कि मुझे लगता है एशियन गेम्स में खेलना ही मेरे लिए पर्याप्त नहीं है। मेडल लाना ही मेरा लक्ष्य है। मेडल लाकर मैं देश का नाम रोशन करना चाहती हूं।
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कैसे खेलते है हैंडबॉल
हैंडबॉल में सात खिलाड़ियों की दो टीमें होती हैं, जो आपस में खेलती हैं। एक टीम के छह खिलाड़ी दूसरे टीम के खिलाड़ियों से बॉल को बचाकर गोल में फेंकते हैं। सातवां खिलाड़ी गोलकीपर की भूमिका अदा करता है। एक मैच 30 मिनट का होता है जो दो अवधियों में बंटा होता है।