बॉलीवुड स्टार आमिर खान जो हर साल भारतीय सिनेमा को अपनी एक बेहतरीन फिल्म से सजा देते हैं। दर्शक उनकी एक्टिंग के कायल होकर वाह-वाही करते नहीं थकते वही आमिर खान का यूपी से बड़ा खास जुड़़ाव है।
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आमिर खान का पुश्तैनी घर
दरअसल आमिर का पुश्तैनी मकान हरदोई जिले के अख्तियारपुरगांव में आज भी बना है। मकान इतना जर्जर हो चुका है कि कभी भी गिर सकता है। वापस लौटकर आज तक यहां न आमिर आए न ही उनके पिता हुसैन।
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आमिर खान का गांव
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले से 40 किलोमीटर दूर शाहबाद कस्बे में बसा है अख़्तियारपुर गांव। एक तरफ तो सुपरस्टार आमिर खान जनता की भलाई के मुद्दों को टीवी और सिल्वर स्क्रीन पर गंभीरता से उठा रहे हैं लेकिन उनके पुश्तैनी मकान की हालत कुछ और बयां कर रही है।
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आमिर खान का गांव
यहां की सड़कें टूटी हैं और बिजली गायब है। गांव वाले खेती-किसानी और मजदूरी करके किसी तरह अपना पेट पाल रहे हैं।
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आमिर खान का पुश्तैनी घर
गांव के एक बुजुर्ग हरिया बाबू ने बताया कि अख़्तियारपुर, जिले का सबसे पिछड़ा गांव है। सड़क पर बिजली के खंभे तो हैं मगर बिजली नहीं, पानी के लिए सिर्फ तीन सरकारी हैंडपंप लगे हैं। उनकी भी हालत खस्ता है
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आमिर खान का गांव
गांव के बुजुर्ग प्रह्लाद बताते हैं कि न तो यहां कोई सरकारी स्कूल है, न अस्पताल। पुस्कालय तो दूर की बात है। बातचीत में ही पता चला कि गांव के 150 घरों में करीब 400 लोग रहते हैं, जिनमें से 90 फीसदी मजदूरी करते हैं। इनमें ज्यादातर दलित हैं।
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आमिर खान का गांव
यहां आमिर की खानदानी मस्जिद भी बनी है। उस पर 'जामा मस्जिद अली बाग' लिखा है और ये जर्जर, वीरान है। अंदर मिट्टी के ढेर देखकर कोई भी बता सकता था कि इसकी काफी दिनों से सफाई नहीं हुई है।
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आमिर खान का गांव
मस्जिद से सटी छत के नीचे आमिर के परदादा हाजी मोहम्मद हुसैन खां की पक्की कब्र बनी है, जिस पर रेत और मिट्टी बिखरी पड़ी है। कब्र के सिरहाने पर लगा पत्थर बताता है कि इसे हाजी बाकर हुसैन खां ने बनवाया था। गांव के जानकार बताते हैं लगभग 25 एकड़ का यह बाग आमिर की मिल्कियत है। इसके अलावा दो बाग और हैं।
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आमिर खान का गांव
असल में आमिर के दादा जाफर हुसैन खां के तीन बेटे बाकर हुसैन खां, नासिर हुसैन खां और ताहिर हुसैन खां, इसी जगह एक साथ रहते थे। पचास के दशक में नासिर हुसैन मुंबई चले गए और कामयाब निर्माता-निर्देशक बन गए। उन्होंने ताहिर हुसैन को अपने पास बुला लिया। वहीं आमिर और फैज़ल पैदा हुए। तबसे यहां से उनका नाता टूट- सा गया।
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आमिर खान का गांव
ताहिर हुसैन को 1975 में निर्मित फिल्म 'जख्मी' के लिए जो ट्रॉफी मिली थी, वह उन्होंने अपने बड़े भाई बाकर हुसैन को उपहार में दी थी। अब वह ट्रॉफी इसी पुश्तैनी घर के गुबार में दब गई है। बरसों पहले चार जनवरी 2008 को फैजल खान जायदाद विवाद के सिलसिले में शाहबाद आए थे।
आमिर के रिश्ते में लगने वाले नईम शाहाबादी अपने सितारा भाई को शिद्दत से याद करते हैं। नईम बताते हैं कि यहां दिलीप कुमार, जॉनी वाकर, रजा मुराद जैसी हस्तियां तशरीफ़ ला चुकी हैं तो आमिर भी एक दिन जरूर आएंगे।