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UP: भ्रष्टाचार...मोटा कमीशन बना था शौक, लग्जरी गाड़ी पर नीली बत्ती रही बरकरार; कन्नौज जेल अधीक्षक पर नए खुलासे

Sat, 10 Jan 2026 02:38 PM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, कन्नौज

सार

कन्नौज जेल में भ्रष्टाचार और कैदियों के निवाले पर डाका डालने का मामला सामने आया है। राशन में लाखों का वारा-न्यारा किया गया। फिजूलखर्ची की भी शिकायत मिली है। जेल अधीक्षक के निलंबित होने के बाद भ्रष्टाचार की परतें खुल रहीं। रसूख के बल पर हर जगह क्लीन चिट मिल जाती थी।
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Kannauj Jail News - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
कन्नौज की जलालाबाद जेल के भीतर न केवल बंदियों के पेट पर डाका डाला जा रहा है, बल्कि सरकारी धन का उपयोग निजी ऐश-ओ-आराम और रसूख दिखाने के लिए किया जा रहा है। जेल अधीक्षक के निलंबित होने के बाद भ्रष्टाचार की परतें खुलने लगीं हैं। कन्नौज जेल इसकी एक बानगी मात्र है।

जिला कारागार में बंद कैदियों के भोजन के नाम पर बड़ा खेल चल रहा है। सूत्रों के मुताबिक, जेल में बंदियों के लिए आने वाली दाल, आटा और चावल की कागजी मात्रा और वास्तविक खपत में जमीन-आसमान का अंतर है। 
 
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बंदियों के जेल से भागने के बाद जांच करती पुलिस - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
सरकारी रिकॉर्ड में राशन की खपत कई गुना ज्यादा दिखाई जा रही है, जबकि हकीकत में बंदियों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता और मात्रा दोनों संदिग्ध हैं। राशन के इस हेरफेर में हर महीने लाखों रुपये का गबन किया जा रहा है, जो सीधे तौर पर एक बड़े सिंडिकेट की ओर इशारा करता है।

 
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बंदियों के जेल से भागने के बाद जांच के लिए आते अफसर - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
सुंदरीकरण के नाम पर कमीशन का खेल
पिछले वर्ष शासन द्वारा जेल के सुंदरीकरण के लिए करीब 1.5 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि आवंटित की गई थी। आरोप है कि इस धनराशि का उपयोग जेल की व्यवस्था सुधारने के बजाय अधीक्षक ने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए किया। उन्होंने अपने कार्यालय को दो बार तुड़वाकर आलीशान तरीके से बनवाया। इतना ही नहीं, जेल के भीतर कई मजबूत द्वारों को बेवजह तुड़वा दिया गया है ताकि नए निर्माण के नाम पर बजट खपाया जा सके।

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जेल से भागा अंकित - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
मोटा कमीशन बना था शौक
जेल के बाहर अंडरग्राउंड वायरिंग और लाइटिंग का काम भी जोर-शोर से चल रहा है। जानकारों का कहना है कि सुंदरीकरण के इन फिजूलखर्ची वाले कामों के पीछे का असली मकसद मोटा कमीशन डकारना है। जितना ज्यादा निर्माण कार्य होगा, उतनी ही बड़ी रकम कमीशन के तौर पर जेब में जाएगी।
 
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जेल से भागा शिवा ऊर्फ डिंपी - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
लग्जरी गाड़ी पर नीली बत्ती रही बरकरार
भाजपा सरकार ने वीआईपी कल्चर खत्म करने के लिए अधिकारियों और नेताओं की निजी गाड़ियों से नीली और लाल बत्ती हटाने के सख्त निर्देश दिए हैं। लेकिन कन्नौज जेल अधीक्षक पर शासन के इन आदेशों का रत्ती भर भी असर नहीं है। वे अपनी निजी लग्जरी गाड़ी में आज भी बेखौफ होकर नीली बत्ती लगाकर घूमते हैं। यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि उनके उस रसूख को भी दर्शाता है जिसके दम पर वे अब तक कई जांचों से बचते आए हैं।
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जिला कारागार का निरीक्षण करते डीएम आशुतोष मोहन अग्निहोत्री व एसपी विनोद कुमार - फोटो : amar ujala
बंदियों से मारपीट और धन उगाही तक के लग चुके आरोप
कन्नौज में दो बंदियों के जेल से भागने के बाद कन्नौज से राजधानी लखनऊ तक कई बार दौड़ लगाने वाले अधीक्षक को आखिरकार शासन ने देर रात निलंबित कर दिया। कानपुर परिक्षेत्र के डीआईजी जेल की रिपोर्ट में प्रथम दृष्टया जेल अधीक्षक को ही दोषी माना गया। इसी आधार पर उनके खिलाफ कार्रवाई हुई है। देर रात इसका आदेश भी जारी कर दिया गया।

 
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जिला कारागार में कंबलों की रस्सी देखते गुरसहायगंज कोतवाल अजय अवस्थी - फोटो : amar ujala
इससे पहले भी जेल अधीक्षक भीमसेन मुकुंद तैनाती स्थलों पर विवादित रहे हैं। उनके कार्यकाल का इतिहास उपलब्धियों के बजाय विवादों, जांचों और गंभीर आरोपों से भरा रहा है। रसूख और पैसे के दम पर तबादले रुकवाने से लेकर बंदियों के साथ मारपीट और धन उगाही तक, मुकंद पर लगने वाले आरोपों की फेहरिस्त काफी लंबी है।

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जेल की चहारदीवारी के किनारे खाली वॉच टॉवर - फोटो : amar ujala
मथुरा में मूर्तियों के गायब होने का प्रकरण भी
मसेन मुकंद के विवादों की शुरुआत वर्ष 1998/99 में जिला कारागार मथुरा से हुई थी। वहां जेलर के पद पर तैनाती के दौरान जेल परिसर में नवीन निर्माण के लिए मुख्य दीवार की खुदाई की जा रही थी। आरोप है कि इस दौरान प्राचीन काल की बेशकीमती मूर्तियां निकली थीं, जिन्हें मुकंद ने कथित रूप से गायब कर दिया। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सीबीआई जांच तक बैठाई गई, हालांकि बाद में उन्हें इस मामले में उन्हें क्लीन चिट मिल गई।

 

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माइक लेकर गाना गाते जेल अधीक्षक भीमसेन मुकुंद - फोटो : amar ujala
सत्ता से टकराव और तबादलों का खेल
वर्ष 2000 में तत्कालीन कारागार मंत्री से विवाद के चलते भीमसेन मुकंद का स्थानांतरण पूर्वांचल की एक जेल में कर दिया गया था। लेकिन चर्चा है कि उन्होंने अपने रसूख और धनबल का प्रयोग कर उस तबादले को बदलवा लिया और नवनिर्मित जिला जेल फिरोजाबाद में जेलर के पद पर तैनाती पा ली। फिरोजाबाद में भी उनका विवाद तत्कालीन अधीक्षक सेवाराम चौधरी से हुआ, जिसका नतीजा यह रहा कि अधीक्षक को ही वहां से हटना पड़ा। इसके बाद जब मुकंद का स्थानांतरण अलीगढ़ किया गया, तो वहां पहले से मौजूद अधीक्षक सेवाराम चौधरी के डर से उन्होंने जॉइनिंग नहीं दी। आदेशों की अवहेलना करने पर शासन ने उन्हें निलंबित कर दिया था।

 

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जिला कारागार में जश्न के दौरान नाच रहा बंदी रक्षक - फोटो : amar ujala
गौतमबुद्ध नगर और मऊ में विरोध की लहर
अधीक्षक के पद पर पदोन्नत होने के बाद उनकी तैनाती गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) में हुई। यहाँ उन पर ''मशक्कत'' के नाम पर वसूली बढ़ाने और बंदियों को मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने के आरोप लगे। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि खुद जेल स्टाफ ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। भारी विरोध के चलते मात्र 6 महीने के भीतर ही उनका तबादला मऊ कर दिया गया।

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कारागार परिसर में नए साल की पार्टी में शामिल लोग - फोटो : amar ujala
फतेहगढ़: संवेदनहीनता और मौत पर हंगामा
मऊ के बाद मुकंद को जिला जेल फतेहगढ़ भेजा गया, जहाँ उनका कार्यकाल सबसे अधिक विवादित रहा। आरोप है कि उनके कार्यकाल के दौरान एक जेल वार्डन ने छुट्टी की गुहार लगाई थी, जिसे मुकंद ने ठुकरा दिया। समय पर इलाज और छुट्टी न मिलने के कारण वार्डन की मौत हो गई, जिसके बाद जेल में जमकर हंगामा और बवाल हुआ। इसी दौरान एक बंदी के साथ मारपीट और धन उगाही का मामला भी सामने आया, जिसके चलते उन्हें फतेहगढ़ से हटाकर कन्नौज भेज दिया गया।
 
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कन्नौज जिला कारागार - फोटो : amar ujala
जांच में जो तथ्य मिले, वह शासन को भेज दिए गए थे। इसी आधार पर जेल अधीक्षक पर कार्रवाई हुई है। जल्द ही नए अधीक्षक की तैनाती की जाएगी। - प्रदीप गुप्ता, डीआईजी जेल, कानपुर परिक्षेत्र
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