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निर्भया कांड के दोषी पवन के समर्थन में उतरे दोनों चाचा, बस्ती में किए चौंकाने वाले दावे

Sat, 21 Dec 2019 10:43 AM IST
विजय जैन डिजिटल न्यूज डेस्क, बस्ती।
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पवन कुमार गुप्ता ने सात साल बाद की दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका - फोटो : अमर उजाला
निर्भया के चार दोषियों में से एक पवन कुमार गुप्ता ने सात साल बाद दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर यह दावा किया है कि वह 2012 में नाबालिग था। पवन मूल रूप से बस्ती जिले के लालगंज थाना क्षेत्र के जगन्नाथपुर का रहने वाला है। यहीं के रहने वाले पवन के दो चाचा जुग्गी लाल व सुभाष चंद्र भी भतीजे के समर्थन में उतर आए हैं। उन्होंने पवन के लेकर कई चौंकाने वाले दावे किए हैं।
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निर्भया का दोषी पवन गुप्ता - फोटो : सोशल मीडिया
पवन के चाचा जुग्गी लाल व सुभाष चंद्र दावा करते हैं कि दुष्कर्म की घटना के वक्त पवन नाबालिग था। वह कहते हैं कि उन्हें पवन की पैदाइश का साल तो ठीक से याद नहीं है, मगर जिस समय घटना हुई, उस समय वह बालिग नहीं था। दोनों चाचा दिल्ली में ही रहते हैं। इन दिनों खेती के लिए गांव आए हुए हैं। उनका कहना है कि पवन का जन्म दिल्ली में ही हुआ था और वह कभी भी गांव नहीं आया।

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निर्भया में दोषियों की फांसी का रास्ता साफ - फोटो : अमर उजाला
चाचा जुग्गी लाल व सुभाष चंद्र ये जरूर मानते हैं कि निर्भया कांड में पवन का नाम आने से उसका गांव जरूर सुर्खियों में आ गया। उसकी हरकत पर आज भी गांव के लोगों को यकीन नहीं होता। इसका जिक्र होते ही उनका सिर शर्म से झुक जाता है। निर्भया कांड के बाद पवन की मां की मौत पर पिता एक बार अपने गांव जगन्नाथपुर आए थे, लेकिन वह क्रिया-कर्म के बाद लौट गए।

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पवन जल्लाद - फोटो : अमर उजाला
दो भाई व दो बहन में सबसे बड़ा पवन दुकानदारी के अलावा ग्रेजुएशन की पढ़ाई भी कर रहा था। पिता ने यहां लालगंज थाने के महादेवा चौराहे के पास गांव में भी जमीन ली थी और उस पर मकान बनवाना शुरू किया था, मगर 16 दिसंबर 2012 में हुए निर्भया कांड के बाद से काम ठप हो गया। चौराहे के पास बना पवन का मकान खंडहर जैसा दिखता है।
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Nirbhaya - फोटो : Social Media
पवन गुप्ता के बचपन के दोस्त और अन्य लड़के कहते हैं कि उसे क्रिकेट का बहुत शौक था। उसने महादेवा में नमकीन बनाने की फैक्ट्री खोली लेकिन वह चल नहीं पाई। इसके बाद वह दिल्ली चला गया और वहां जूस का व्यवसाय करने लगा। पवन गुप्ता के परिवार के लोग दिल्ली के आरकेपुरम रविदास कैंप में रहते हैं, जो इन दिनों फांसी की चर्चा सुनकर सहम से गए हैं।
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nirbhaya case - फोटो : सोशल मीडिया
पवन के पिता, दादी और बहन आदि परिवार के सदस्य आरकेपुरम इलाके के उसी संतरविदास कैंप में रहते थे। दोनों का मानना था कि उन्हें न्याय पाने के लिए प्रयास करने का मौका नहीं दिया गया। निचली अदालत ने 10 सितंबर 2013 में जब उसे फांसी की सजा सुनाई तो गांव में लोगों ने समर्थन किया लेकिन दादी ने उसके छूटने की बात की थी। 13 मार्च 2014 में हाईकोर्ट व 27 मार्च 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा बरकरार रखी। अब दया याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर परिवार की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
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