यूपी के गाजीपुर यानी लहुरी काशी में गंगा किनारे भूमिहीन किसान काफी मेहनतकश होते हैं। रेत पर खेती-बारी कर वे परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का प्रबंध कर रहे हैं। इस काम में परिवार का हर सदस्य एक-दूसरे का साथ देता है। खेती से लेकर बाजार तक काम करना पड़ता है।
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ककड़ी, सब्जी की खेती कर रहे किसान।
- फोटो : अमर उजाला
गंगा किनारे रहने वाले अनगिनत भूमिहीन किसान इस समय काफी खुश हैं। ये केवल मेहनत से रोजाना हजार रुपये तक कमा रहे हैं।
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किसानी में महिलाएं भी करती हैं पूरा सहयोग।
- फोटो : अमर उजाला
लहुरी काशी के नाम से प्रसिद्ध गाजीपुर से होकर जीवन दायिनी गंगा गुजरी हुई हैं। गंगा किनारे सैदपुर से लेकर बक्सर को ओर निकाली हैं।
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तरबूज की भी खेती कर रहे किसान।
- फोटो : अमर उजाला
यहां गंगा किनारे बसे लोग बाढ़ के दिनों में परेशान होते हैं, लेकिन, गर्मी के दिनों में मेहनत करने वाले भूमिहीन किसान भी मालामाल हो जाते हैं। यकीन नहीं तो ददरी घाट को ही ले सकते हैं।
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कड़ी धूप में मेहनत करते हैं भूमिहीन किसान।
- फोटो : अमर उजाला
यहां एक ओर गंगा की शांत लहरें बहती हैं तो वहीं दूसरी ओर जीवन की जद्दोजहद में डूबे किसान रेत के टापू पर एक नई उम्मीद बोते नजर आते हैं। यहां किसान अनगिनत हैं, जिनके पास अपनी जमीन नहीं, लेकिन हौसला बेहिसाब है।
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मिलजुल कर करते हैं खेती-किसानी।
- फोटो : अमर उजाला
गर्मियों की तपती धूप में ये गंगा की रेत पर उगाए गए खीरा, ककड़ी, तरबूज उगा रहे हैं। बड़ी बात है यह कोई आम खेती नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, समर्पण और सामूहिक प्रयास की खेती है।
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महिलाएं करती हैं भरपूर मेहनत।
- फोटो : अमर उजाला
रोजाना यहां भोर में ककड़ी, सब्जी आदि को तोड़ते हैं और नावों से घाट तक लाते हैं।
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माल की ढुलाई में नाव का लेते हैं सहारा।
- फोटो : अमर उजाला
यह नजारा रोजाना भोर में चार बजे से छह बजे तक देखा जाता हगै। जहां महिलाएं, बुजुर्ग, बच्चे अपने परिवार के साथ सिर पर टोकरी उठाए घाट की सीढ़ियां चढ़ते नजर आते हैं।
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परिवार का सहयोग करते हैं नन्हें किसान।
- फोटो : अमर उजाला
संकट मोचन मंदिर के पीछे अस्थायी मंडी सजती है, जहां शहर के व्यापारी आते हैं, और थोक में माल खरीदकर ले जाते हैं। यह दौर अप्रैल माह से लेकर जून तक चलता है। यही खेती इनके जीवन में आर्थिक संबल और आत्मसम्मान लेकर आती है।
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बाजार में ऐसे बेचते हैं माल।
- फोटो : अमर उजाला
सुनें इनकी
मैं नाशपाती, खीरा, ककड़ी बोया हूं। 25 हजार रुपये लागत लगाए हैं। पौधों में पानी देने के लिए रेत में फावड़े से गड्ढा किया हूं। इसमें गंगा का पानी रिसाव होकर भर जाता है, जिसके बाद डब्बा-डब्बा पानी निकालकर पौधों ड़ालता हूं। मैं इस समय रात में 3 बजे से 6 बजे तक ककड़ी तोड़ता हूं। फिर बेच देता हूं। ऐसा यहां से लेकर जमानिया तक के लोग करते हैं। - जुन्ने, सरैया
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सुबह से शाम तक होता है काम।
- फोटो : अमर उजाला
दिसंबर से एक बीघा में खेती कर रहा हूं। हमने तीस हजार लगाए हैं। इसमें हमारा तीन परिवार लगा है। पहले बालू में गड्ढा खोदकर बीज बोते हैं। पौधा आने पर खाद देते हैं, इसके बाद कुआ नुमा गड्ढा बनाकर उसमें से डब्बा-डब्बा पानी निलाकर पौधा खेती करते हैं। एक ककड़ी थोक में दो रुपये के हिसाब से बेचते हैं। - त्रिभुवन, सरैया
किसानी के साथ खान-पान की व्यवस्था करती हैं महिलाएं।
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इस काम में महिलाओं का भरपूर योगदान रहता है। वे किसानी में तो सहयोग करती ही हैं। इसके साथ ही पुरुषों के लिए खाना और नाश्ते का भी प्रबंध करती हैं। खेत के किनारे ही छोटी सी झोपड़ी बनाकर किसान अपने सब्जियों की रखवाली करते हैं। इसी झोपड़ी में वे रहते भी हैं।