माघी पूर्णिमा पर रविवार को संगम में आस्था की लहरें उमड़ पड़ीं। गिरने, फिसलने और धक्का खाने की चिंता किए बगैर लोग पुण्य की डुबकी लगाने के लिए बढ़े। संगम जाने वाले मार्गों से लेकर घाटों की सर्क्युलेटिंग एरिया तक श्रद्धालुओं की भीड़ अपनी धुन में रमी रही। एक तरफ स्नान और दूसरी ओर अर्घ्य और दीपदानकी होड़ मची रही।
मेला प्रशासन ने शाम तक 26 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के संगम पर डुबकी लगाने का दावा किया। माघ मेला के अंतिम स्नान के बाद कल्पवासी भी घर लौटने लगे। माघी पूर्णिमा पर संगम स्नान के लिए आधी रात से ही श्रद्धालुओं का तांता लग गया था।
उदया तिथि की मान्यता की वजह से सूर्योदय केसाथ ही माघी पूर्णिमा का स्नान आरंभ हुआ। भोर में हर्षवर्धन चौराहे से लेकर काली मार्ग, लाल मार्ग पर आस्थावानों का कारवां चल पड़ा।
रूट डायवर्जन और मेला क्षेत्र के मार्गों पर वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित होने की वजह से लंबी दूरी तय कर लोगों को संगम पहुंचना पड़ रहा था, लेकिन इसके बावजूद किसी के चेहरे पर भी कोई शिकन नहीं थी। दूर-दराज से आए लोग संगम की दूरी पूछते हुए आगे बढ़ते रहे।
रेती पर अर्घ्यदान के साथ ही अन्न, वस्त्र व दीपदान भी होता रहा। महिलाएं तटों पर स्नान के बाद धूप, दीप के साथ मां त्रिवेणी की आरती उतारती रहीं। मंगल गीत गाए जाते रहे। ऐसा दृश्य सिर्फ संगम पर ही नहीं, बल्कि सभी छह सेक्टरों में बने स्नान घाटों पर देखा गया।
हर तरफ चकर्ड प्लेट मार्गों से लेकर घाटों और पांटून पुलों तक श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों से भी लोग संगम की ओर बढ़ते रहे। निजी वाहनों से श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार पहुंचती रही। लाल मार्ग और काली मार्ग से लेकर मेला क्षेत्र में गंगा पर बने सभी पांच पांटून पुलों पर भी सिर पर गठरी लिए आस्थावानों की कतारें दिन भर लगती रहीं।