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प्रयागराज में स्वीकृत हुआ था राम मंदिर का प्रारूप 

Sun, 10 Nov 2019 01:54 AM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
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ayodhya case - फोटो : प्रयागराज
अयोध्या आंदोलन में शुरुआत से ही प्रयागराज काफी अहम रहा। विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे स्वर्गीय अशोक सिंहल ने राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े तमाम महत्वपूर्ण फैसले प्रयागराज से ही लिए थे। यहां वर्ष 1989 में हुए महाकुंभ के दौरान विश्व हिंदू परिषद की धर्म संसद अयोध्या आंदोलन का अहम पड़ाव साबित हुई। इसी धर्मसंसद में अयोध्या में प्रस्तावित श्रीराम मंदिर का प्रारूप स्वीकृत हुआ था।
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ayodhya case - फोटो : प्रयागराज
संगम की रेती में विहिप की यह धर्मसंसद 30 और 31 जनवरी 1989 में हुई थी। तब इस धर्मसंसद में सैकड़ों की संख्या में संतों के साथ देश-विदेश से आए विहिप कार्यकर्ताओं ने शिरकत की थी। इस धर्मसंसद में प्रस्तावना भाषण तत्कालीन महामंत्री अशोक सिंहल ने दिया था। इस दौरान कांची शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती की मौजूदगी में श्री राम मंदिर का प्रारूप स्वीकृत किया गया। साथ ही यह भी तय हुआ कि आंदोलन को यूपी की सीमा से बाहर निकालकर देशव्यापी बनाया जाए। इस धर्मसंसद में वर्ष 1985 में कर्नाटक के उडुप्पी में हुई विहिप की धर्मसंसद का भी उल्लेख किया गया।
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ayodhya case - फोटो : प्रयागराज
इस दौरान संतों ने अयोध्या स्थित श्री राम जन्मभूमि, वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ और मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान का सारा क्षेत्र हिंदुओं को लौटाने की मांग पुरजोर तरीके से की गई। विहिप प्रांत कार्यालय प्रभारी सुनील बताते हैं कि तब अशोक सिंहल के ओजस्वी भाषण की चारों ओर चर्चा हुई थी। तब की केंद्र सरकार ने भी उनके भाषण की रिकार्डिंग स्थानीय प्रशासन की मदद से दिल्ली तलब की थी। उन्होंने बताया कि विहिप की पहली धर्मसंसद जो सात एवं आठ अप्रैल 1984 को दिल्ली में शंकराचार्य स्वामी शांतानंद महाराज की अध्यक्षता में हुई थी, उसमें भी अशोक सिंहल ने प्रयागराज के सैकड़ों कार्यकर्ताओं के साथ भाग लिया था। उस धर्मसंसद में ही पहली बार अयोध्या में राम जन्मभूमि हिंदुओं को सौंपे जाने की मांग की गई थी। इसके अलावा देवहरा बाबा की उपस्थिति में स्वीकृत श्रीराम मंदिर के प्रारूप के देशभर में लाखों चित्र वितरित किए गए।

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ayodhya case - फोटो : प्रयागराज
राम मंदिर निर्माण में सभी हिंदुओं की सहभागिता हो, इसके लिए विहिप के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अशोक सिंहल ने प्रयागराज से एक विशेष अभियान की शुरूआत की थी। उन्होंने प्रत्येक हिंदुओं से इस आंदोलन के लिए सवा-सवा रुपये भेंट स्वरूप लेने का आदेश विहिप कार्यकर्ताओं को दिया था। इस आदेश के बाद विहिप कार्यकर्ताओं की टोली देश भर में घूमी। 

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर तब शायद ही ऐसा कोई मोहल्ला और गांव बचा रहा होगा, जहां विहिप कार्यकर्ताओं ने हिंदुओं से सवा रुपये न लिए हो। विहिप के प्रांत संगठन मंत्री मुकेश कुमार बताते हैं कि वर्ष 1989 में प्रयागराज में हुई धर्म संसद के बाद विहिप का यह अभियान देश भर में चला। इस आंदोलन को देश व्यापी बनाने के लिए जन्मभूमि के शिलान्यास केलिए देश के प्रत्येक गांव से पूजित एक-एक श्रीरामशिला लेने की भी बात हुई। तब देश भर के पौने तीन लाख गांवों में श्रीरामशिला पूजन के कार्यक्रम संपन्न करके पूजित श्रीरामशिलाएं अयोध्या पहुंचाई र्गईं। दक्षिण भारत, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश से आने वाली श्रीरामशिलाएं प्रयागराज के रास्ते ही अयोध्या पहुंचवाई गईं। इस दौरान तमाम शिलाओं अशोक सिंहल की मौजूदगी में यहां पूजन भी किया गया। इसके अलावा 1989 में हुई विहिप की धर्मसंसद में ही इलाहाबाद का नाम ‘प्रयाग’ रखे जाने एवं किला स्थित अक्षयवट को जनता के दर्शन, पूजन और अर्चन के लिए खोल दिए जाने की मांग की गई थी। 
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ayodhya case - फोटो : प्रयागराज
ढांचा गिरने के बाद विहिप हो गया था श्री राम सत्संग मंडल

प्रयागराज। अयोध्या में विवादित ढांचा गिरने के बाद राम मंदिर आंदोलन की अगुवाई कर रही विश्व हिंदू परिषद पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। तब विहिप पर प्रतिबंध लगने के साथ ही उसके तमाम नेता गिरफ्तार कर लिए गए थे। बहुत से नेताओं को  नजरबंद भी कर लिया गया था। विहिप पर प्रतिबंध लगने के बाद संगठन के पदाधिकारियों ने गुपचुप तरीके से ‘श्री राम सत्संग मंडल’ का गठन कर अपनी सारी गतिविधियां शुरू कर दीं। 

सत्संग मंडल गठन करने का विचार अशोक सिंहल ने ही दिया था। इस दौरान प्रयागराज स्थित विहिप के कीडगंज कार्यालय में सन्नाटा पसर कर गया था। बाद में यहां ताला भी लगा दिया गया। हालांकि बाद में विहिप के कुछ कार्यकर्ताओं ने यह ताला तोड़ दिया। दरअसल विवादित ढांचा गिरने के दौरान प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को केंद्र सरकार ने बर्खास्त कर दिया था। इसके बाद केंद्र सरकार ने विहिप पर प्रतिबंध भी लगा दिया। इसके बाद सिंहल जब प्रयागराज आए तो विहिप के सामने फंड आदि का संकट गहरा गया था। क्योंकि विहिप के सारे बैंक खाते सरकार ने सीज करवा दिए थे। तब सिंहल की सलाह पर ‘श्री राम सत्संग मंडल’ की पर्ची विहिप ने छपवाई और देशभर के लाखों हिंदुओं से दान लिया। उस दौरान हाशिमपुर स्थित स्वर्गीय सिहंल का आवास महावीर भवन एलआईयू की निगरानी में था। 
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dr. murali manohar joshi - फोटो : प्रयागराज
डा. जोशी के आंगिरस से तब भाजपा लेती थी अहम निर्णय

प्रयागराज। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अयोध्या पर दिए गए निर्णय के बाद प्रयागराज में डा. मुरली मनोहर जोशी का आवास रहे ‘आंगिरस’ में शुक्रवार को सन्नाटा छाया रहा। इस बंगले को डा. जोशी ने भले ही बेच दिया हो लेकिन, अयोध्या आंदोलन को लेकर भाजपा की तमाम रणनीति इसी बंगले में बना करती थी। डा. जोशी के कई समर्थकों ने शुक्रवार को सोशल मीडिया में बंगले की तस्वीर पोस्ट की। यह भी कहा कि अयोध्या पर दिए गए निर्णय से राम आंदोलन की इस बंगले से जुड़ीं स्मृतियां एक बार फिर से ताजा हो गईं। 

दरअसल, वर्ष 1992 में जिस दौरान अयोध्या में विवादित ढांचा गिराया गया था तब डा. मुरली मनोहर जोशी ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। हालांकि, राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के दौरान उनका प्रयागराज आना जाना कम होता था लेकिन, उनके टैगोर टाउन स्थित बंगले में भी अयोध्या आंदोलन को लेकर तमाम रणनीति बना करती थी। डा. जोशी के करीबी बृजेश गुप्ता बताते हैं कि अशोक सिंहल और डा. जोशी में खूब बनती थी। दोनों ही नेता प्रयागराज में अगर होते थे तो उनकी मुलाकात आंगिरस और महावीर भवन में होती थी। अयोध्या आंदोलन को लेकर भी तमाम महत्वपूर्ण फैसले इन्हीं दोनों भवन में लिए गए। भाजपा नेता देवेंद्र नाथ मिश्र ने आंगिरस में सिंहल के अलावा विनय कटियार, उमा भारती समेत संघ के तमाम नेताओं ने आंदोलन की रणनीति बनाई थी। इस आंदोलन के पूर्व डा. जोशी ने कन्याकुमारी से कश्मीर तक एकता यात्रा निकाली। इस यात्रा में डा. जोशी के साथ शामिल हुए व्रतशील शर्मा ने बताया कि यात्रा के दौरान डा. जोशी अयोध्या आंदोलन की भी चर्चा करते थे।
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ayodhya case - फोटो : प्रयागराज
प्रयागराज। विश्व हिंदू परिषद के अयोध्या आंदोेलन की तमाम रणनीति अशोक सिंहल के गुरू कहे जाने वाले ठाकुर गुरुजन सिंह की मौजूदगी में ही बनती थी। तब विहिप की सारी गतिविधियां कीडगंज स्थित कार्यालय और हाशिमपुर  स्थित अशोक सिंहल के आवास महावीर भवन से ही संचालित होती थी। ठाकुर गुरुजन सिंह तब कीडगंज में ही रहा करते थे। वह प्रचारक के तौर पर विहिप में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे।

ठाकुर गुरुजन सिंह से राय मशवरा किए बगैर विहिप कोई भी बड़ा निर्णय नहीं लेती थी। अशोक सिंहल सभी प्रमुख मुद्दों पर एकांत में उनकी राय जरूर लेते थे। दिसंबर 1992 में अयोध्या जाने के पूर्व सिंहल ने ठाकुर गुरुजन सिंह से लंबी वार्ता की थी। उस दौरान लगातार कार सेवक अयोध्या पहुंच रहे थे। अधिकांश कार सेवक महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश एवं गुजरात राज्य के थे। उन सभी को अयोध्या में नियंत्रित करने के लिए छह दिसंबर के पूर्व ही अशोक सिंहल ठाकुर  गुरुजन सिंह के कहने पर रवाना हो गए थे। अयोध्या में रहने के दौरान सिंहल वहां की सारी गतिविधियों के बारे में हर रोज उन्हें दो बार फोन से जरूर अवगत कराते थे। विवादित ढांचा गिरने के बाद भी सिंहल ने सबसे पहले इसकी जानकारी ठाकुर गुरुजन सिंह को  ही दी थी। 

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ayodhya case - फोटो : प्रयागराज
प्रयागराज। विश्व हिंदू परिषद में रहने के दौरान सूबे केे डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के पास अयोध्या आंदोलन के दौरान अहम जिम्मेदारी थी। तब उनके पास विहिप में संगठन मंत्री का दायित्व था। आंदोलन के दौरान कार सेवकों तक भोजन-पानी पहुंचाने की जिम्मेदारी उनके पास ही थी। केशव के करीबी नेता बताते हैं कि जिस दिन अयोध्या में विवादित ढांचा गिरा, उस दिन केशव मौर्य विहिप के सभी वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ अयोध्या में ही थे। इस दौरान अशोक सिंहल, तत्कालीन भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. मुरली मनोहर जोशी आदि नेताओं के साथ वह भी गिरफ्तार हुए थे।

राम मंदिर आंदोलन से केशव शुरू से ही जुड़े रहे। अयोध्या आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद वह अशोक सिंहल के बेहद करीब आ गए। अशोक सिंहल भी उन्हें काफी मानते थे। कीडगंज में विहिप कार्यालय में ही तब केशव मौर्य का ज्यादातर समय बीतता था। अयोध्या आंदोलन के दौरान वर्ष 2002 में राम भक्त सम्मेलन के दौरान उन्हें प्रयागराज में नजर बंद कर लिया गया था। भाजपा के मीडिया प्रभारी पवन श्रीवास्तव बताते हैं कि उस दौरान उन्हें नजर बंद कर लेने से नाराज उनके समर्थकों ने चक्काजाम कर दिया था। केशव के ही करीबी एवं भाजपा नेता मनोज कुशवाहा ने बताया कि विहिप पदाधिकारी होने के दौरान ही केशव मौर्य की सलाह पर ही बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ाके आत्म रक्षा के लिए गदा मिली। तब केशव मौर्य का तर्क था कि संघ के स्वयंसेवकों के पास आत्मरक्षा के लिए लाठी है। इसी तर्ज पर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के पास गदा होनी चाहिए। 
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ayodhya case - फोटो : प्रयागराज
प्रयागराज। राम मंदिर आंदोलन के दौरान कारसेवकों की सेवा के लिए हजारों शहरियों ने 1992 में पूरा इंतजाम कर रखा था। आंदोलन से सभी को जोड़ने के लिए हर घर से आठ रोटी ली जाती थी। रोटी एकत्र करने के बाद उसे उस स्थान पर पहुंचाया जाता था, जहां-जहां कारसेवकों को ठहराया गया था। लोगों में मंदिर आंदोलन को लेकर उत्साह इस कदर था कि इस पूरे काम में बच्चों से लेकर वृद्ध कार्यकर्ता तक सभी अनुशासित ढंग से अपनी भूमिका निभा रहे थे।
शहर से लेकर गांव तक सैकड़ों स्थानों पर कारसेवकों के ठहरने का इंतजाम किया गया था।

उस क्षेत्र के सभी कार्यकर्ता कारसेवकों की सेवा को ही राम का कार्य मानकर कर रहे थे। भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष व जनसंघ से जुड़े रहे राघवेंद्र मिश्र बताते हैं कि 1992 में लोगों में राम धुन सवार थी। लाखों कारसेवक जिले में मौजूद थे। सभी अयोध्या नहीं जा पाए थे। वे बताते हैं कि 6 दिसंबर 1992 को आधे से भी कम कारसेवक अयोध्या पहुंच पाए थे। बाकी सभी को रोक दिया गया था और उनके लिए रहने और भोजन आदि की व्यवस्था स्थानीय स्तर पर भी कार्यकर्ताओं को सौंपी गई थी। राघवेंद्र मिश्र कहते हैं कि देश की सुप्रीम अदालत का जो फैसला आया है, वो बहुत अच्छा है। इसे भारत के स्वाभिमान का फैसला कहा जा सकता है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ दक्षिणी क्षेत्र के संचालक राजेंद्र प्रसाद मिश्र कहते हैं उस वक्त कारसेवकों के लिए सेवा का कार्य करने वाले भी किसी कारसेवक से कम नहीं थे। उन्होंने पूरे सेवाभाव के साथ लोगों के लगभग महीनेभर काम किया। परेशानियां भी बहुत आईं लेकिन, उत्साह और उमंग के आगे कुछ पता ही नहीं चला। इतने लंबे संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, जो देर से ही सही लेकिन दुरुस्त है। एंग्लो बंगाली इंटर कॉलेज में खेल के शिक्षक रवींद्र मिश्र बताते हैं कि उनका पूरा परिवार कारसेवकों की सेवा के लिए तत्पर था। खुद वह साइकिल से घर-घर जाकर रोटी इकट्ठा करते थे और उसे कारसेवकों तक पहुंचाते थे। घर-घर राम शिला का पूजन भी कराने की जिम्मेदारी भी इन्हीं कार्यकर्ताओं की थी।
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