फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

तस्वीरें: नागा साधुओं की रहस्यमयी दुनिया का बड़ा सच, जानकर नहीं होगा विश्वास

Sat, 19 Jan 2019 10:55 AM IST
vivek shukla न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
विज्ञापन
1 of 6
kumbh
यूं तो नागा संन्यासी जीवन भर कड़े नियम-व्रत का पालन करते हैं लेकिन, उनको खुद का श्रृंगार करना भी बेहद पसंद है। यह उनकी नागा परंपरा का ही एक हिस्सा है। इसमें 17 श्रृंगार का जिक्र है। नागाओं का जमावड़ा होने पर परंपरागत श्रृंगार करके ही उसमें शामिल होते हैं। खास तौर से शाही स्नान से पूर्व सभी नागा सन्यासी श्रृंगार के बाद गंगा में डुबकी लगाने जाते हैं।
विज्ञापन

2 of 6
Naga sadhu - फोटो : Social media
नागा परंपरा में धूने की भभूत सबसे पवित्र मानी जाती है। नागा साधुओं का जीवन इसी धूना के इर्द-गिर्द ही सिमटा होता है। इसके बगैर उनका डेरा कहीं नहीं जमता। धूना से निकली भभूति नागा संन्यासियों का पहला आभूषण होता है। भगवान शिव का प्रसाद मानकर नागा इसे पूरे शरीर पर मलते हैं। इसके अलावा नागा परंपरा में नख से शिख तक श्रृंगार का प्रचलन है। 
विज्ञापन

3 of 6
Naga sadhu and Aghori
नागा साधुओं के मुताबिक भभूति, चंदन का लेप, जटा में पुष्प की माला एवं चंद्रमा, आंखों में काजल, माथे पर लाल रंग की रोली का लेप, रुद्राक्ष का बाजूबंद, कलाई में चांदी का कड़ा, गले में रुद्राक्ष की माला, रोली का त्रिपुंड, कमरपेटी की तरह फूलों की माला, पांव में चांदी का कड़ा, हाथों में चिमटा और डमरू। नागा इसे ही आभूषण मानते हैं।

4 of 6
Naga sadhu - फोटो : Reuters
इनको धारण करने के बाद ही नागाओं का श्रृंगार पूर्ण होता है। अमूमन नागा सन्यासी महाकुंभ में यह श्रृंगार करते हैं। शाही स्नान से पूर्व सभी नागा अपने-अपने अखाड़े में जुटते हैं और अपना यह श्रृंगार करते हैं। श्रीशंभू पंच अग्नि के नागा सन्यासी हरीश गिरि के मुताबिक नागाओं के लिए शाही स्नान में शामिल होना एक बारात जैसा होता है। इसको लेकर उनके भीतर खासा उल्लास होता है। देश भर के नागा संन्यासी सिर्फ इसी मौके पर एक स्थान पर एकत्रित होते हैं इसलिए वह पूरे श्रृंगार के साथ उसमें हिस्सा लेते हैं।
विज्ञापन

5 of 6
Naga Sadhu
जटिल है भभूति बनाने की क्रिया
नागा संन्यासी पूरे शरीर पर भभूति लपटने के बाद और भी रहस्यमयी नजर आने लगते हैं लेकिन, यह कोई सामान्य भभूति नहीं होती। बल्कि लंबी क्रिया के बाद तैयार होने वाली एक खास तरह की भभूति होती है। इसे तैयार करने में घंटों लगते हैं। इसे तैयार करने के लिए नागाओं को खासा अभ्यास करना पड़ता है। उसके बाद ही वह इसमें दक्ष हो पाते हैं। भभूति नागा सन्यासियों के सामने हमेशा प्रज्जवलित रहने वाले धूना से बनती है लेकिन, वहां से निकालकर इसे सीधे धारण नहीं किया जाता बल्कि उसे कई विधियों से तैयार किया जाता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

6 of 6
Naga Sadhu
धूने में सिर्फ बड़, आंवले, बेल, मदार की लकड़ियां ही इस्तेमाल में आती हैं। इससे निकली भभूति में चंदन मिलाकर गाय के उपले में जलाया जाता है। इसके पूरी तरह भस्म हो जाने पर इसे छानकर अलग किया जाता है। उसके बाद इसमें गाय का कच्चा दूध और चंदन मिलाकर इसके लड्डू बनाए जाते हैं। इसके बाद इसको फिर से जलाते हैं। जितना बचता है, उसे छानकर फिर अलग करते हैं। एक हिस्से में गंगा जल मिलाकर अलग कर दिया जाता है, उसे गंग भभूति कहते हैं जबकि दूसरे हिस्से को देव भभूति कहते हैं। उसमें कच्चा दूध मिलाकर उसे ही नागा शरीर पर धारण करते हैं। शाही स्नान से पहले सभी नागा अपनी परंपरा के मुताबिक अपने शरीर में इसे लपेटकर स्नान को जाते हैं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें