नागा साधुओं के भावों को जानने के लिए सेक्टर 19 में एक नागा संन्यासी से संपर्क किया गया। उनका कहना था कि नागाओं की आक्रामक होना तो बहुत ही स्वभाविक है, क्योंकि वो एक योद्धा होते हैं। आदिगुरु शंकराचार्य ने उन्हें बनाया ही इसी लिए है कि वो सनातन की रक्षा करें। आदिगुरु ने तो कहा ही था कि जब तक एक हाथ में शास्त्र और दूसरे हाथ में शस्त्र न हो तो धर्म की रक्षा करना मुश्किल है, फिर भी आप जो नागाओं के स्वरूपों में बदलाव देखते हैं वो उनके दीक्षा के कारण भी होता है। कौन-सा नागा किस तरह का भाव में रखेगा यह उसकी दीक्षा पर निर्भर करता है।
सभी का एक ही लक्ष्य, सनातन की रक्षा
हम आपको बता दें कि प्रयागराज के महाकुंभ में दीक्षा लेने वालों को राजेश्वर नागा कहा जाता है। वहीं उज्जैन में दीक्षा लेने वालों को खूनी नागा। हरिद्वार में दीक्षा लेने वालों को बर्फानी व नासिक में दीक्षा लेने वालों खिचड़िया नागा के नाम से जाना जाता है। इन सभी का एक ही लक्ष्य होता है और वह है सनातन की रक्षा करना। माना जाता है कि इन सभी में खूनी नागा साधुओं का स्वभाव सबसे अधिक उग्र होता है। ये सैनिक का भाव रखते हैं और धर्म की रक्षा के लिए खून भी बहा सकते हैं।
कइयों को दी जाती है अहम जिम्मेदारियां
अखाड़ों की ओर से नागा साधुओं में कुछ का चुनाव कर कुछ अहम जिम्मेदारियां दी जाती हैं। कौन-सा नागा किस जिम्मेदारी को निभाएगा उसके लिए पद भी निर्धारित होते हैं। वो कुछ इस प्रकार से होते हैं। इनमें अखाड़े के हिसाब से बदलाव भी हो सकता है।
- आचार्य महामंडलेश्वर
- महामंडलेश्वर
- श्रीमहंत
- मंहत
- थाना पति
- अष्ट कौशल
- श्री पंच
-श्री शंभू पंच
- पंच परमेश्वर
- मुखिया महंत
- कारोबारी
- कोठारी
- नागा सैनिक