'जिन भेषा मोरे ठाकुर रीझैं, सो ही भेष धरूंगी' की रट के साथ राधा की दासी बनी 'सखियां, कान्हा को रिझाने के लिए कुंभ मेले में आ जुटी हैं। कुंभ पर्व के दौरान स्त्री का रूप धरे अखाड़े-अखाड़े घूमती सखियां भजनों से कृष्ण के प्रति अपना अनुराग व्यक्त करती हैं। संतों, श्री महंतों, नागा संन्यासियों के ठौर पर जाकर भजन गाकर कान्हा को रिझाती और श्रद्धालुओं को लुभाती हैं। संतों से मिले न्योछावर से ही उनकी आजीविका चलती है। सखी भाव का यही राग संतों के शिविरों में गूंज रहा है।