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कुंभ 2019: कान्हा को रिझाने कुंभ मेले में पहुंचीं सखियां, खुद को मानती हैं राधादासी

Wed, 23 Jan 2019 01:18 PM IST
vivek shukla अनिल सिद्धार्थ, अमर उजाला, प्रयागराज
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'जिन भेषा मोरे ठाकुर रीझैं, सो ही भेष धरूंगी' की रट के साथ राधा की दासी बनी 'सखियां, कान्हा को रिझाने के लिए कुंभ मेले में आ जुटी हैं। कुंभ पर्व के दौरान स्त्री का रूप धरे अखाड़े-अखाड़े घूमती सखियां भजनों से कृष्ण के प्रति अपना अनुराग व्यक्त करती हैं। संतों, श्री महंतों, नागा संन्यासियों के ठौर पर जाकर भजन गाकर कान्हा को रिझाती और श्रद्धालुओं को लुभाती हैं। संतों से मिले न्योछावर से ही उनकी आजीविका चलती है। सखी भाव का यही राग संतों के शिविरों में गूंज रहा है।
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Radha Krishna Holi - फोटो : PTI
साड़ी पहने, माथे पर बेंदी, बिंदी, टीका, सिंदूर, गले में मंगलसूत्र, होठों पर लिपिस्टिक, आंखों में काजल, हाथ में कंगन चूड़ी, कमर में तगड़ी, कान में बुंदे सजाए और पांव में पायल, बिछिया, महावर रचाए सखियां किसी सुहागन जैसी दिखती हैं। हालांकि कान्हा की दीवानी ये सखियां तन से पुरुष ही हैं, जो गोपीभाव में रहकर कान्हा को रिझाने के लिए सोलहों शृंगार करती हैं। भोर में अखाड़ों की मंगला आरती के बाद से ही अलग-अलग टोलियों में निकलीं सखियों का भजन गाकर न्योछावर मांगने का क्रम आरंभ होता है, जो दिन के भंडारे से पहले और दोपहर के बाद से देर शाम तक जारी रहता है।
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नंदा महोत्सव में राधा-कृष्ण नाटिका पेश करते बच्चे - फोटो : अमर उजाला
अतीत की चर्चा पर सखी सीमा बोलीं, बचपन में जरा-जरा सी बातों पर मन उदास होने पर निराशा आती थी, लेकिन न कोई समझाने वाला था, न सही राह दिखाने वाला, गुरु का साथ मिला तो साथ रहते-रहते सखियों का भाव आ गया। दीपा, सोनी, राजकुमारी की कहानी भी इससे अलग नहीं है। बोलीं, समाज से यथोचित सम्मान नहीं मिला, कोई राह नहीं सूझी तो मंदिरों के चक्कर लगाते, सखियों के संपर्क में आते-आते उन जैसा ही संस्कार अपना लिया। अब तो ठाकुर जी में ही मन रमता है, हमेशा उन्हीं की छवि सामने होती है। बैरागियों से इतर पूरे सोलह शृंगार के साथ सखियां रंग-बिरंगे कपड़ों में होती हैं, पर गले में कंठी-माला भी है।

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राध्ााकृष्ण
तिलक तय करता है अखाड़े से नाता
निर्मोही अनी अखाड़ा, श्रीमहंत राजेंद्र दास ने कहा कि वैसे तो बैरागियों के तकरीबन सभी संप्रदायों में सखियां हैं लेकिन राधा बल्लभी निर्मोही अखाड़े से इनका करीबी नाता है। गले में तुलसी की माला और माथे तिलक लगाने का तरीका ही उनका संप्रदाय तय करता है। अगर वह रामानंदी संप्रदाय की हैं तो लाल तिलक और अगर कृष्णानंदी हैं तो माथे पर श्रीजी राधा के नाम की बिंदी होगी।
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गुरु देते सखी बनने की दीक्षा
दिगंबर अनी अखाड़ा, श्रीमहंत कृष्ण दास नगरिया ने कहा कि शारीरिक रूप से यह पुरुष ही हैं लेकिन संगत के प्रभाव से मन में सखी भाव आकर सखी बन गईं। हालांकि सिर्फ सखी भाव आने से ही नहीं सखी बनने के लिए गुरुदीक्षा जरूरी है। कई वर्षों तक साधु रूप में परीक्षा केबाद गुरु ही तिलक सहित झोला, कंठी-माला के साथ मंत्र की दीक्षा और स्त्रियों के वस्त्र, शृंगार की वस्तुएं देकर सखी स्वरूप देते हैं।
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