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प्रयागराज: पोटली में बंद सपने, भविष्य की चिंता लिए चल पडे़ छात्र

Thu, 30 Apr 2020 12:10 AM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
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prayagraj news - फोटो : prayagraj
प्रयागराज। ‘छोटे-छोटे शहराें से, रात भोर दोपहरों से हम तो झोला उठा के चले।’ सिविल लाइंस हनुमान मंदिर तथा आसपास के इलाके में कांधे पर बैग लिए सैकड़ों युवाओं को देखकर बरबस ही गाना याद आ गया लेकिन इन होनहारों के बैग में रखीं किताबाें के रूप में में बंटी-बबली की कारस्तानियों की कहानी नहीं बंद थी और न ही उनके चेहेर पर वह बेफ्रीकी ही थी। इन युवाओं की पोटली में बंद थे उनके सपने और चेहरे पर थी भविष्य की चिंता जिसे लेकर वे अपने-अपने घरों के लिए निकले थे।
 
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prayagraj news - फोटो : prayagraj
बाहर से आकर यहां तैयारी करने वाले छात्र-छात्राओं को उनके घर पहुंचाने के लिए बुधवार को तीसरे दिन भी बसों की रवानगी हुई। लाकडाउन में फंसे सैकड़ों छात्र-छात्राओं की भीड़ सुबह ही हनुमान मंदिर, लोक सेवा आयोग, सुभाष चौराहा तथा आसपास के क्षेत्रों में एकत्रित हो चुकी थी। बसों के संचालन का समय सुबह नौ बजे से निर्धारित था लेकिन इससे पहले ही तय स्थलों पर युवाओं का लंबी कतार थी। कंधे पर बैग, ट्राली बैग लिए हर तरफ से छात्र-छात्रा पैदल चले आ रहे थे। पता नहीं लाकडाउन तथा यह बंदिशें कब तक रहेंगी।
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prayagraj news - फोटो : prayagraj
इसलिए इन बैग में कपड़ों के साथ ज्यादातर विद्यार्थी किताब-कापी के अलावा बिस्तर भी पैक करके ले जा रहे थे। ईसीसी बीएससी अंतिम वर्ष के छात्र अभिषेक मऊ जाने के लिए हनुमान मंदिर चौराहा पर बैठे थे। अभिषेक का कहना था, बताया जा रहा है कि अब अगस्त तक परीक्षा नहीं होगी। इसलिए किराया पर लिया मकान छोड़ दिया। जो सामान पैक नहीं हो पाया उसे मित्र के यहां रख दिया। आजमगढ़ की बस के इंतजार में खड़े प्रतियोगी नितिश गौड़, अपूर्व का भी यही कहना था। उनका कहना था कि अब जब परीक्षाओं की तिथि घोषित होंगी तभी आना होगा।

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गाजीपुर के राजीव यादव, पुनीत ने यहीं से परास्नातक की पढ़ाई पूरी की और अब तैयारी में जुटे हैं। कुछ बनने की चाहत में वह 10 वर्ष से यहां हैं लेकिन इस दौरान यह पहला मौका था जब उन्होंने घर जाते समय एक बोरी में किताबें भी समेट लीं थीं। दोनों ही प्रतियोगी यहां ट्यूशन से खर्च चलाते थे लेकिन अब भी उसकी उम्मीदें दूर तक नहीं दिख रहीं थी।
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आजमगढ़ की बस में बैठे रोहित, आशीष पांडेय का कहना था कि सरकार का यह फैसला स्वागत योग्य है। यहां खाना तक की समस्या खड़ी हो गई थी। इस तरह की प्रतिक्रिया ज्यादातर युवाओं की थी लेकिन परीक्षाओं को लेकर असमंजस के बीच उनके चेहरे पर भविष्य की चिंता और निराश भी साफ झलक रही थी।
 
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मुश्किल घड़ी : गई नौकरी, पकड़नी पड़ी घर की राह
 सुबह करीब साढ़े नौ बजे का वक्त। सिविल लाइंस हनुमान मंदिर के आसपास हर तरफ युवाओं का हुजुम है। उनके बीच में किनारे की तरफ फुटपाथ पर एक परिवार की मौजूदगी सभी का ध्यान खींचती है। करीब 30 वर्ष के संजय अपनी पत्नी और दो नन्हें बच्चों के साथ बस का इंतजार का कर रहे हैं। उनके चेहरे की उदासी खुद बयां कर देती है कि दर्द बड़ा है। बहुत पूछने पर संजय बताते हैं, वह अंबेडकर नगर के हैं। यहां चौक में एक कपड़े की दुकान पर नौकरी करते थे लेकिन अब काम नहीं है। पास में कुछ भी नहीं बचा है।
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इस पूरी वार्ता के दौरान संजय तो खुद को संभाले रखते हैं लेकिन पत्नी की आंखों से आंसू छलक पड़े और अपने पल्लू से उसे छुपाने की नाकाम कोशिश करती हैं। संजय बताते हैं, गांव पर मां की भी तबीयत खराब है। सुना कि लड़कों को घर भेजने के लिए बसें चलाई जा रही हैं। इसी उम्मीद में चला आया कि उन्हें भी इसी बस से घर भेज दिया जाएगा। मां की बीमारी से संबंधित पर्चा की फोटो भी मोबाइल पर मंगा ली है। ताकि, बस में बैठने की अनुमति मिल जाए। संजय के अलावा अन्य कई लोग भी थे जो यहां कोई काम नहीं होने की वजह से घर जाने के लिए बस स्टैंड पर पहुंचे थे। साथ में उनका पूरा परिवार भी था। 
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पहले कई किमी की पैदल यात्रा, फिर यहां-वहां का भटकाव
 निर्धारित स्थलों पर छात्र-छात्राओं के पहुंचने का क्रम सुबह ही शुरू हो गया था। सुबह नौ बजे तक बसें भी कतार से लग गई थीं लेकिन कौन सी बस कहां जाएगी इसे बताने वाला कोई नहीं था। इसकी वजह से छात्र-छात्राओं को काफी भटकना पड़ा। छात्र-छात्रा पहले से ही कई किमी की पैदल यात्रा तय करके वहां पहुंचे थे। हाथ में सामान से भरे बैग भी थे। इससे उनका बुरा हाल था। ऐसे में सही जानकारी नहीं मिलने से उनमें नाराजगी के साथ निराशा भी रही।
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