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'बड़ी मुश्किल से दाग हल्का हुआ है, फिर गहरा मत करो', छलक पड़ा अलीगढ़ के लोगों का दर्द

Wed, 26 Feb 2020 12:43 PM IST
प्राची प्रियम अमर उजाला ब्यूरो, अलीगढ़
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अलीगढ़ का माहौल - फोटो : अमर उजाला
अलीगढ़ के बुजुर्ग और हिंदू मुस्लिम समुदाय के लोगों ने पिछले पांच दशकों में अलग-अलग समय पर हुए सांप्रदायिक दंगों की घटनाओं को बयां किया और सबसे अधिक जरूरत शांति और संयम की बताई। अमर उजाला द्वारा सराय हकीम में मंगलवार को दोनों समुदायों के लोगों के साथ संवाद किया गया। इसमें बुजुर्गों ने पांच दशकों में अब तक हुई घटनाओं के संबंध में बताया। साथ ही कहा कि शांति बड़ी चीज है।
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अलीगढ़ में पत्थरबाजी - फोटो : अमर उजाला
रघुवीरपुरी निवासी बुजुर्ग इंद्र मोहन शर्मा कहते हैं कि उन्होंने सन् 1971, 1977, 1980, 1990, 1992 और 2007 का दंगा देखा है। यह अच्छी बात है कि पिछले दस वर्ष से भी अधिक समय से कोई ऐसी घटना अब नहीं हुई है। अब जरूरत इसी तरह के जज्बे को बनाए रखने की है।   
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चप्पे-चप्पे पर फोर्स तैनात - फोटो : अमर उजाला
जमालपुर निवासी कुंवर कय्यूम अली कहते हैं कि किसी भी समाज में आपस में टकराव होना स्वाभाविक बात है, लेकिन इसके बाद सामंजस्य और सौहार्द भी बने रहना चाहिए। शहर के लोगों को समझदारी से काम लेना होगा। जयगंज में काजीपाड़ा निवासी मशहूर शायर बाबर इलियास कहते हैं कि नफरतों से भला क्या हासिल हुआ है? 

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उपद्रव के कारण बंद पड़ी दुकानें - फोटो : अमर उजाला
शहर की पेशानी से दंगे का दाग बड़ी मुश्किल से हल्का हुआ है। लोगों की जिम्मेदारी है कि यह फिर से गहरा न हो जाए। सराय लबरिया निवासी मुन्ना भाई, लक्ष्मी पुरी निवासी अजय राजौरिया, सराय रहमान निवासी इरशाद, अशोक नगर निवासी विनोद पांडेय कहते हैं कि शहर के माहौल को सामान्य रखने की जिम्मेदारी सभी की है, क्योंकि माहौल खराब होने का नुकसान सभी को है। यह शहर सभी का है। 
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उपद्रव में घायल जवान - फोटो : अमर उजाला
संवाद में आए सुरेंद्र नगर के रहने वाले बुजुर्ग महेंद्र पहलवान कहते हैं कि सन् 1980 में जब दंगा नियंत्रण करने में प्रशासन को परेशानी हो रही थी तो आगरा से तेज तर्रार आईपीएस अधिकारी बीपी सिंह को आगरा से अलीगढ़ बुलाया गया था। उस समय लंबे समय तक कर्फ्यू लगा रहा।
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हिंसा में घायल को साथ ले जाते साथी - फोटो : अमर उजाला
पुराने शहर में लोग घरों में कैद होकर रह गए और रोजमर्रा की जरूरत की चीजों को लेकर परेशानी होने लगी। उस समय सेंटर प्वाइंट (उस समय यह नाम नहीं था। टीकाराम मंदिर के पास कहकर लोग संबोधित करते थे) पर कुछ दुकानें प्रोविजन स्टोर, मेडिकल स्टोर आदि की थीं। यहां शहर के लोग खरीदारी करने के लिए आते थे। कहा जाता है कि यहीं से सेंटर प्वाइंट पर रौनक बढ़ने लगी।
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