मैं खेत में शौच के लिए आया था। झरना नाले के पास ही था। तभी तेज आवाज आई। लगा कि नाले में कोई बस या ट्रक गिरा है। मैं दौड़ा आया, बस गिरी थी। चीख पुकार मची थी। बस आधी से ज्यादा डूब चुकी थी। लोग बाहर निकलना चाह रहे थे, लेकिन शीशे लगे थे। बस से खून बाहर आ रहा था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूं, मेरे पास मोबाइल भी नहीं था, जो किसी को फोन करके बुला लेता। मैं पानी में उतर गया। शीशा तोड़ा, बस से दो -तीन लोगों को बाहर निकाला। एक की जेब में मोबाइल था, उसे लेकर 100 नंबर पर पुलिस को फोन किया। बस हादसे के बाद सबसे पहले देवदूत बनकर पहुंचे निहाल सिंह ने हादसे के बाद बचाव कार्य शुरू किया। आगे की स्लाइड में पढ़िए हादसे की आंखों देखी पूरी घटना...
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बस हादसे के बाद राहत और बचाव कार्य में जुटे स्थानीय लोग व पुलिसकर्मी
- फोटो : अमर उजाला
मैंने सोचा, पुलिस तो पता नहीं कब आएगी। मुझे ही कुछ करना होगा, वरना सब लोग मर जाएंगे। जिन्हें बाहर निकाला था, उनमें से एक युवक ने पैर पकड़ लिए। बोला, मेरी पत्नी और बच्चे अंदर हैं, उन्हें निकलवाओगे, देर हुई तो मर जाएंगे। मैं भागकर गांव गया, गांव पास में ही है एक डेढ़ किलोमीटर पर। मैंने गांव में जाकर शोर मचाया, लोग दौड़े चले आए। हम लोग मौके पर पहुंचे। पुलिस 10 मिनट बाद आ तो गई लेकिन दो ही सिपाही थे, वे क्या करते।
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घटनास्थल पर पहुंचकर घायलों को बाहर निकालने वाले छलेसर चौकी इंचार्ज अनिरुद्ध
- फोटो : अमर उजाला
पुलिस और एक्सप्रेसवे की जेसीबी भी नहीं आई थी। हमारे गांव में कुछ लोगों के पास जेसीबी है, वे ले आए। हम सभी नाले में कूद गए और बस से लोगों को बाहर निकालने लगे। 30 मिनट बाद छलेसर चौकी से और पुलिसवाले आ गए। वे भी हमारे साथ लग गए। हमने घायलों और मृतकों को बाहर निकाला लेकिन तब तक एंबुलेंस नहीं आई थी। पुलिसवालों ने फोन किया, तब जाकर एंबुलेंस आई लेकिन तब तक एक घंटा बीत चुका था। घायलों को अस्पताल ले जाया जाने लगा। तब तक आसपास के गांवों से बहुत लोग आ चुके थे।
एक महिला घायल थी, उसके सिर से खून बह रहा था, हाथ की हड्डी टूट चुकी थी लेकिन वह अपने जख्मों न देखकर अपने पति और बच्चे को ढूंढ रही थी। उसे बाहर निकाल दिया था। वह जिद कर रही थी कि उसे पति और बच्चे को दिखाओ, वरना अस्पताल नहीं जाऊंगी। उससे पुलिस ने कहा कि आपके पति और बच्चे पहले ही अस्पताल चले गए हैं।
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नाले में गिरी बस
- फोटो : अमर उजाला
मृतकों के शव नाले के पास ही रखे गए। उन्हें देखकर कलेजा मुंह को आ रहा था। मैंने पहली बार इतनी लाशें देखी थीं। सुबह से भूखा था, लेकिन दोपहर तक कुछ खा नहीं पाया। लाशों का मंजर शायद लंबे समय तक भूल न पाऊं।
जिन घायलों को बस से निकाला गया, वे लहूलुहान थे। कई लोग परिवार के साथ थे। इन्हें अपनी चिंता नहीं थी। एक युवक लाशों के ढेर में अपनी बच्ची को ढूंढ रहा था। खून से लथपथ लखनऊ की एक महिला अपने पति को तलाश रही थी। ये लोग पुलिस से यही कह रहे थे कि घायलों और मृतकों की सूची दिखाओ, तब तक कोई सूची नहीं बनी थी। मैं सबसे पहले पहुंचा था, इसलिए लोग मेरे पास आते, पूछते। कहते क्या तुमने उसे देखा है ? एक साल की बच्ची है, लाल फ्रॉक पहनी है, मैं कुछ नहीं बता पा रहा था, उनकी हालत देखकर मेरी आंख से आंसू निकल आए।