'मर्यादा खतरे में है कुछ कहा नहीं जाता।
हे राम...यह दर्द हरो, अब सहा नहीं जाता।।'
हैदराबाद में बेटी के साथ हैवानियत पर महिलाएं किस कदर व्यथित हैं, डॉ. रुचि चतुर्वेदी की दो पंक्तियां बयां कर रही हैं। घटना भले ही अपने शहर से कोसों दूर हुई हो, लेकिन बेटी के शव से उठी 'लपटें' आगरा की आधी आबादी के दिलों में उठती देखी। उनके विचार जानने के लिए अमर उजाला ने अपराजिता अभियान के तहत सिकंदरा स्थित कार्यालय में संवाद कार्यक्रम रखा। इसमें चिकित्सक, अधिवक्ता, कवियत्री, शिक्षिका, समाजसेवा से जुड़ी महिलाएं शामिल हुई।
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संवाद कार्यक्रम में महिलाएं
- फोटो : अमर उजाला
नारी शक्ति ने आगाह किया कि भविष्य में ऐसी घटना हुई तो श्रद्धांजलि तक ही उनका विरोध नहीं सीमित रहेगा। महिलाएं एकजुट होंगी, सड़कों पर उतरेंगे और सामाजिक रूप से कामकाज का बहिष्कार किया जाएगा। जरूरत पड़ी तो संसद पर धरने से भी पीछे नहीं हटेंगे। नारी शक्ति न मांग की है कि हैदराबाद कांड के हैवानों को सरेआम सजा दी जाए ताकि दोबारा ऐसी घटना ना हो सके।
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प्रतिभा जिंदल और मंजू द्विवेदी
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अपराधी को सार्वजनिक स्थानों पर दी जाए सजा: प्रतिभा जिंदल
समाजसेविका प्रतिभा जिंदल ने कहा कि सख्त कानून के साथ अपराधियों में इसका डर भी बैठना चाहिए। इसके लिए दुष्कर्मियों को सार्वजनिक स्थानों पर सजा दी जाए, जिससे औरों को संदेश जाए। ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार भी किया जाना चाहिए। अभिभावकों से भी अपील है कि गलत करने पर बच्चों के पक्ष में न खड़े हो जाएं।
दुष्कर्मियों को सजा देने को रात में भी लगे कोर्ट: मंजू द्विवेदी
अधिवक्ता मंजू द्विवेदा ने कहा कि बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान से ही काम नहीं चलने वाला। समाज में घूम रहे मानसिक और विक्षिप्त लोगों की पहचान करने की भी जरूरत है। दुष्कर्म जैसी हैवानियत दिखाने वालों को सजा दिलाने के लिए रात में कोर्ट चलवाए जाएं। मामलों की जल्द सुनवाई कर इनको फांसी पर लटका दिया जाए।
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मधु शर्मा और श्रेष्ठा मिश्रा
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जघन्य अपराधों में सजा के लिए तय हो समय: मधु शर्मा एडीजीसी
एडीजीसी मधु शर्मा ने कहा कि सख्त कानून के साथ समय पर न्याय मिलना जरूरी है। दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराधों की जांच और न्याय का समय तय किया जाए। ऐसा होने से अपराधियों में कानून का खौफ बढ़ेगा, और भी इससे सबक लेंगे। लंबे समय तक केस चलने से अपराधियों को बढ़ावा मिलता है।
देर होने पर कामकाजी महिलाओं को घर छुड़वाने की व्यवस्था: श्रेष्ठा मिश्रा, अधिवक्ता
अधिवक्ता श्रेष्ठा मिश्रा ने कहा कि कामकाजी महिलाओं का कार्य समय तय हो, देर होने पर उनको घर छुड़वाने की व्यवस्था भी की जाए। महिलाओं को और ज्यादा जागरूक होने की जरूरत है। किसी भी गलत होने के आभास हो तो तत्काल सचेत हो जाएं। पुरुषों को नैतिक और सामाजिक मूल्यों का भी आभास कराया जाए।
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नूतन अग्रवाल और अनुपमा शर्मा
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जनप्रतिनिधियों को कानून-प्रशासन के लिए उठानी होगी आवाज: नूतन अग्रवाल
कवियत्री नूतन अग्रवाल ने कहा कि कानून व्यवस्था ठीक होने से काफी हद तक अपराध कम किए जा सकते हैं। इसका जिम्मा जनप्रतिनिधियों का भी है, वो इन मुद्दों पर कभी भी पुलिस-प्रशासन के खिलाफ आवाज नहीं उठाते हैं। इसकी वजह से पुलिस-प्रशासन लापरवाही बरतती है और अपराधियों में इनका डर नहीं रहता है।
बेटियों को आत्मरक्षार्थ के लिए किया जाए प्रशिक्षित: डॉ. अनुपमा शर्मा
वरिष्ठ चिकित्सक डॉ अनुपमा शर्मा ने कहा कि बेटा-बेटी के पालन में भेदभाव बंद करना होगा। अभिभावक शुरू से ही बेटियों को कमजोर और बर्दास्त करने की सीख देकर बेटों की हर गलत-सही बातों का समर्थन करते हैं। इससे उनको ना सुनने की आदत नहीं रहती। बेटों को भी संस्कारित करें। बेटियां आत्मरक्षार्थ के लिए प्रशिक्षित करें।
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डॉ. मधुरिमा शर्मा और रेनू वर्मा
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अपराध रोकने के बजाए, नेताओं की बेवजह टिप्पणी से होता दुख: डॉ. मधुरिमा शर्मा
शिक्षिका डॉ मधुरिमा शर्मा ने कहा कि घटना के बाद राजनीतिक लोगों की टिप्पणियां सुनकर आत्मा और रोती है। कानून का पालन और अपराध रोकने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी वहां की सरकार की है। कई बार सरकार लोगों के आक्रोश को दबाने के लिए बेगुनाहों को पकड़ लेते हैं। जरूरी है कि अपराधी ही पकड़ा जाए और उसे सजा मिले।
पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए नैतिक मूल्यों की शिक्षा: डॉ. रेनू वर्मा
शिक्षिका डॉ. रेनू वर्मा ने कहा कि दुष्कर्म की घटनाएं बढ़ने के लिए जीवन मूल्यों की कमी बड़ी वजह है। सरकार को चाहिए कि नैतिक और सामाजिक मूल्यों की शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए। इसके लिए हर बोर्ड के पाठ्यक्रमों में इसे शामिल किया जाए। स्कूलों में सभी धर्मों की पढ़ाई और उनके जीवन मूल्य भी पढ़ाए जाएं। इससे बच्चे संस्कारित होंगे।
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नीलू धाकरे और श्रुति गुप्ता
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किसी के साथ गलत तो हर तरफ से उठे आवाज: नीलू धाकरे
समाजसेविका नीलू धाकरे ने कहा कि कई बार अपराधियों को इसलिए शह मिल जाती है कि उनका सार्वजनिक तौर पर विरोध नहीं होता। महिलाओं के साथ अगर कोई ऐसा करता है तो आसपास के लोगों को भी विरोध करना चाहिए। बेटा-बेटी दोनों को संस्कारित करें, खासतौर से बेटों से भी देर से आने-जाने पर सवाल-जवाब करें।
पारिवारिक मूल्यों की कमी से बढ़ रही हैं घटनाएं: श्रुति गुप्ता
समाजसेविका श्रुति गुप्ता ने कहा कि पारिवारिक मूल्यों की कमी से दुष्कर्म, छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ रही हैं। सख्त कानून के साथ जरूरी है कि बच्चों को भी सामाजिक मूल्य विकसित करने पर ज्यादा जोर दिया जाए। अब भले ही संयुक्त परिवार न हों, लेकिन यह कार्य मां ज्यादा बेहतर कर सकती हैं। वो बेटों को महिलाओं के सम्मान देने के लिए शिक्षित करें।
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वत्सला प्रभाकर और शीतल अग्रवाल
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बंद होनी चाहिए अश्लील साइट: वत्सला प्रभाकर
समाजसेविका वत्सला प्रभाकर ने कहा कि बच्चियों से लेकर बुजुर्ग तक दुष्कर्म का शिकार हो रही हैं। इसकी बड़ी वजह अश्लील साइट हैं। फोन और इंटरनेट पर यह आसानी से उपलब्ध हैं। कार्य क्षेत्र हो या फिर कॉलेज, ऐसे स्थानों पर भी लोग फोन पर अश्लील साइट देखते हैं। सरकार को चाहिए कि इनको बंद कर दिया जाएगा।
बेटियों को चुप रहने की न दी जाए शिक्षा: शीतल अग्रवाल
शिक्षिका शीतल अग्रवाल ने कहा कि ये समाज की विडंबना है कि बेटियों को शुरू से ही चुप रहने की सीख दी जाती है। इसके चलते बेटियां घर में भी सुरक्षित नहीं हैं। सगे-संबंधियों की हरकतों का शिकार होने पर भी वह कुछ नहीं बोल पाती। इसमें घर की महिलाओं को भी दोष है, वह सामाजिक डर के चलते विरोध नहीं करने देती।
डॉ. रुचि चतुर्वेदी और अलका सिंह
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फिल्म-विज्ञापन में अश्लीलता रुके: डॉ. रुचि चतुर्वेदी
कवियत्री डॉ रुचि चतुर्वेदी ने कहा कि अश्लील साइट ही नहीं फिल्म, सीरियल और विज्ञापन में फूहड़ता और अश्लीलता परोसी जा रही है। हालत यह है कि बच्चों के साथ टीवी भी नहीं देख सकते। इस तरह के कार्यक्रम बच्चों के मानसिक रूप से प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि छोटे बच्चे व्यस्कों की तरह इन पर चर्चा करते पाए गए हैं।
बच्चों को मोबाइल की लत से बचाएं अभिभावक: अल्का सिंह
रंगकर्मी अल्का सिंह ने कहा कि कई बार मां-बाप बच्चों को व्यस्त रखने के लिए उन्हें मोबाइल दे देते हैं, धीरे-धीरे उसकी लत बन जाती है। मारधाड़ वाले मोबाइल खेलते हैं। अश्लील सामग्री उन तक आसानी से पहुंच जाती है। चाहिए कि बच्चों को खेलकूद और उनके साथ समय बिताएं, जिससे उनके दिमाग में विकृतियां नहीं आएं।