डुग, डुग, डुग बजता डमरू और भालू के पैरों में बंधे घुंघरुओं की छमछम... इस बीच कलंदर की जोरदार आवाज, मेहरबान, कदरदान, मेरा कालू आया है... सबको नाच दिखाएगा, बता कालू दिखाएगा... भालू सिर हिलाकर हामी भरता है। बचपन का यह दृश्य 35 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के जेहन में जरूर होगा। आगरा जिले में करीब 25 वर्ष पहले तक कलंदर मोहल्लों और सड़कों पर भालुओें का नाच दिखाते थे। उनके इशारों पर भालू तरह-तरह के करतब करते थे। पशु क्रूरता और संरक्षित वन्य जीव अधिनियम के चलते कलंदरों से भालू लेकर 1999 में कीठम में बने संरक्षण केंद्र में भेजे गए। भालू लेते समय पालकों से पुनर्वास के वादे किए गए। भालुओं का पुनर्वास हुआ लेकिन कलंदरों का नहीं। गांव कौरई के कलंदरों के मुताबिक करीब 300 वर्षों से उनके पुरखे इसी काम से जुड़े थे। करीब 22 साल पहले भालुओं का पुनर्वास शुरू हुआ। रोजगार और आवास सहित अन्य वादे कर वर्ष 2006 तक सभी कलंदरों से भालू ले लिए गए। 16 वर्ष बाद भी ज्यादातर कलंदरों के सिर पर न छत है न ही रोजगार। पेश है अमर उजाला की खास रिपोर्ट।
विज्ञापन
2 of 5
कौरई गांव के कलंदर
- फोटो : अमर उजाला
साहब... वादे तो बहुत किए, मिला कुछ नहीं
फतेहपुर सीकरी से पहले हाईवे पर ही एक गांव है कौरई। कलंदरों का निवास स्थान। अमर उजाला की टीम जब यहां पहुंची तो एक पेड़ के नीचे 13 लोग बैठे थे। हाल पूछा तो 69 साल के फूल उद्दीन तो जैसे रो ही पड़े। बोले - क्या बताएं साहब... बच्चों की तरह पाले हमारे भालू ले लिए, मेरा अमिताभ (भालू) ही मेरा सब कुछ था, उसके तमाशे से दो वक्त की रोटी मिलती थी, अब तो दूसरों के मोहताज हैं। 65 वर्षीय नौशाद खान ने बताया कि भालू लेते वक्त प्रशासन ने वादे तो बहुत किए, लेकिन मिला कुछ नहीं। जिन्होंने स्वेच्छा से दे दिए उन्हें 50 हजार रुपये दिए गए, जो नहीं माने उनसे छीन लिए। बिजेंदर ने बताया कि रोजगार का वादा किया था, पढ़-लिखकर भी उनके बच्चे दिल्ली में मजदूरी कर रहे हैं।
विज्ञापन
3 of 5
झोपड़ी में रहते हैं कलंदर के परिवार
- फोटो : अमर उजाला
वक्त की मार, सिर पर छत न रोजगार
गांव कौरई में छप्पर के नीचे दो बच्चों को लेकर महिला बैठी थी। नाम फिरोजा बताया, बोली- साहब वक्त की मार है, अब सिर पर छत भी नहीं है। बच्चों को पढ़ाया लेकिन एक होटल में वेटर है, दूसरा बेरोजगार है। वहीं के निवासी लालू ने बताया कि कुछ लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना से एक किस्त मिली तो कमरे की दीवारें खड़ी गईं। उसके बाद से बस इंतजार ही कर रहे हैं। खैरुद्दीन ने बताया कि बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ा-लिखा रहे हैं, उम्मीद है कभी तो सरकार को उनकी याद आएगी। इनके अलावा फरियाद, औसाफ खान, लाडला, विजेंद्र, राहुल, निहाल, आसमोहम्मद, सहनदीन आदि ने भी अपनी व्यथा बताई।
4 of 5
कौरई गांव के कलंदर
- फोटो : अमर उजाला
दलील- पेंशन और आवास के प्रयास
कौरई गांव के प्रधान बंटी सिसौदिया का कहना है कि कलंदरों की मदद के लिए प्रयास जारी हैं। बुजुर्गों की पेंशन और पीएम आवास योजना के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। गांव के रास्ते पर खड़ंजे के लिए भी प्रार्थनापत्र दिया हुआ है।
दावा- कर रहे हैं मदद
वाइल्ड लाइफ एसओएस के डॉ. बैजूराज ने बताया कि जिन कलंदरों से भालू लिए गए उन्हें 50 हजार रुपये दिए गए थ। उनकी बेटियों की शादी के लिए भी 5000 रुपये दिए जाते हैं। सभी वादे पूरे किए जा रहे हैं।
नाई की मंडी के राशिद बताते हैं कि 30 साल पहले 10 वर्ष की उम्र में पहली बार मोहल्ले में भालू का नाच देखा था। काफी भीड़ थी। भालू के नाच और तमाशे के बाद कलंदर को इनाम मिलता था। अशोक नगर के सर्वेश कुलश्रेष्ठ ने बताया कि भालू का तमाशा उन दिनों बच्चों के लिए बड़े कौतूहल का विषय था। सड़क पर कहीं तमाशा हो रहा हो और बच्चे न रुकें। कलंदर के इशारों पर भालुओं के करतब खूब लुभाते थे।
पुनर्वास के हों प्रयास
बेलनगंज के दीपक खंडेलवाल ने कहा कि हमने भी बचपन में भालुओं का नाच देखा है। प्रशासन ने कलंदरों से वादे किए हैं तो उन्हें पूरा भी करे। उनके पुनर्वास और उनके बच्चों के लिए रोजगार का भी प्रयास हो।