यह कैसी विडंबना कि वो जीते जी परिवार की भूख मिटाने को दर-दर भटकता रहा। कहीं भी उसे काम नहीं मिला। लेकिन मौत के बाद मुआवजे के रूप में परिवार का पेट भरने का इंतजाम हो गया। प्रशासन ने पीड़ित परिवार को मुआवजे के रूप में खाद्यान देकर अपना दायित्व पूरा कर लिया। मुआवजा भी दाल, चावल और आटा। यह दर्दभरी कहानी कासगंज के कस्बा बिलराम निवासी पूरन की है, जिसका गांव की गलियां से दिल्ली की सड़कों तक मुफलिसी ने पीछा नहीं छोड़ा।
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रोते बिलखते परिजन और ग्रामीण महिलाएं
- फोटो : अमर उजाला
पूरन ने पहले तो कस्बे में ही काम तलाशा। फिर कई दिनों तक कासगंज में काम खोजता रहा। कहीं भी उसे मजदूरी नहीं मिली। शाम को मायूस होकर जब घर लौटता था तो वो बच्चों के चेहरे निहारकर टूट जाता था। बच्चे बड़ी उम्मीद से पिता के आने की राह देखते थे। गरीबी ने मासूमों की किलकारियां भी छीन ली थीं। बच्चों की यह हालत उससे देखी नहीं गई तो लोगों से कुछ रुपये उधार लेकर काम की तलाश में दिल्ली चला गया।
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पूरन की मौत के बाद शोकाकुल परिवार
- फोटो : अमर उजाला
दिल्ली में पूरन ने काम की तलाश की। बदकिस्मती एवं मुफलिसी ने यहां भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। तीन दिनों तक वो दिल्ली में काम के लिए दर-दर भटका। लेकिन काम न मिलने पर वो दिल्ली से भी मायूस होकर लौट आया। इस शुक्रवार की शाम जब वो घर में घुसा था बच्चों के चेहरे मुरझाए हुए थे। पत्नी की ओर निहार उसकी आंखे भर आईं थी। रात को उसने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
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पूरन की मौत के बाद मिला राशन
- फोटो : अमर उजाला
शनिवार को जब पूरन की मौत की खबर प्रशासन को मिली तो मौके पर अफसर पहुंचे। नायब तहसीलदार कीर्ति चौधरी के निर्देश पर परिवार को 20 किलो आटा, 10 किलो चावल और 2 किलो दाल उपलब्ध कराई गई। इसके अतिरिक्त और कोई मुआवजा फिलहाल नहीं दिया गया है। नियमों का हवाला देकर परिवार को आश्वासन दिया है कि जो भी संभव होगा प्रशासन मदद करेगा।
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राशन कार्ड पर नहीं चढ़ा अगस्त का राशन
- फोटो : अमर उजाला
मृतक पूरन की पत्नी सुनीता पांच माह की गर्भवती है। नियम के अनुसार गर्भवती महिलाओं को प्रतिदिन पोषाहार के रूप में पंजीरी उपलब्ध कराई जाती है। सुनीता की माने तो उसे पंजीरी भी नहीं मिल रही थी। पंजीरी ही मिलती तो भी उसके बच्चे पंजीरी खाकर गुजारा कर लेते। उसके परिवार के लिए तो पोषाहार ही राहत दे जाता।
जीते जी तो दूर मरने के बाद भी गरीबी ने पूरन का साथ नहीं छोड़ा। मृतक के शव का अंतिम संस्कार करने के लिए चंदा करना पड़ा। अंतिम संस्कार की सामग्री के लिए भी सहयोग मांगा गया। चंदे से गरीब के शव का शाम को अंतिम संस्कार हुआ। मृतक पूरन के चार बच्चे हैं, जिनमें बड़ी बेटी रेखा 20 वर्ष की और 15 वर्ष की गुड़िया है। जबकि 7 वर्ष की हेमलता और ढाई वर्ष का छत्रपाल मासूम है।