चंबल नदी में लुप्त होने की कगार पर पहुंचे जीव-जंतुओं की प्रजातियों को नया बसेरा मिला है। यहां घड़ियाल, मगरमच्छ, डॉल्फिन और कछुओं की संख्या बढ़ रही है। देसी-विदेशी पक्षियों को भी यह प्राकृतिक घरौंदा रास आ रहा है।
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चंबल नदी में डॉल्फिन
- फोटो : अमर उजाला
पांच अक्टूबर, 2009 को डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित कर संरक्षण के लिए चंबल को चुना गया था। जबकि 1979 से घड़ियाल, मगरमच्छ और कछुओं का संरक्षण हो रहा है। दुनिया में लुप्त हुई कछुओं की आठ प्रजातियां चंबल में मौजूद हैं। जिनमें नमामि गंगे प्रोजेक्ट में शामिल बटागुर कछुए भी शामिल हैं।
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चंबल नदी में विदेशी पक्षी
- फोटो : अमर उजाला
जलीय जीवों ही नहीं चिड़ियों के लिए भी चंबल क्षेत्र प्रकृति का खूबसूरत घरौंदा बनकर सामने आया है। यहां पर दुनिया की 80 फीसदी इंडियन स्कीमर मौजूद हैं।
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बार हैडेड गूज
- फोटो : अमर उजाला
ब्लैक बिंग्ड स्टिल्ट, रडी सैल्डक, बार हैडेड गूज, ब्लैक नेक्ड स्टार्क, व्हाइट नेक्ड स्टार्क, फ्लेमिंगो आदि विदेशी चिड़ियां भी यहां आकर अपने घोंसले बनाने लगी हैं। खतरे में पड़ी गौरेया की आबादी भी चंबल में फल फूल रही है।
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चंबल नदी में कछुआ
- फोटो : अमर उजाला
चंबल नदी में इस समय 1876 घड़ियाल, 706 मगरमच्छ, 74 डॉल्फिन और 10 हजार से ज्यादा कछुए हैं।
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चंबल के पानी में घड़ियाल
- फोटो : अमर उजाला
ईको टूरिज्म को बढ़ावा दे रहे
चंबल का पानी घड़ियाल, मगरमच्छ, डॉल्फिन, कछुओं को संरक्षण देने में कामयाब हुआ है। विदेशी चिड़ियां भी यहां आकर प्रजनन करने लगी हैं। अब इसे ईको टूरिज्म के लिए विकसित किया जा रहा है। -आरके सिंह राठौड़, उप वन संरक्षक, चंबल सेंक्च्युरी बाह
लोगों को प्राकृतिक संसाधनों के महत्व और संरक्षण के प्रति जागरूक करने के लिए हर साल 28 जुलाई को विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस मनाया जाता है। इस बार का ध्येय वाक्य है, स्वस्थ समाज के लिए स्वस्थ पर्यावरण जरूरी है।