कारगिल युद्ध में भारत माता के वीर सपूतों ने प्राणों की आहुति देकर जीत दिलाई थी। इसमें जिले के पांच वीर सपूतों ने भी अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। उन वीर सपूतों की शहादत ने मैनपुरी को भी इतिहास में अमर कर दिया। ग्रामीण आज भी अपने जिले रणबांकुरों की कहानी ताजा कर उनकी शौर्य गाथाएं लोगों को बताते हैं।
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कारगिल युद्घ में शहीद हुए प्रवीण कुमार यादव की प्रतिमा
- फोटो : अमर उजाला
कारगिल युद्घ को बीस साल हो रहे हैं। शहर से सटे गांव अंजनी निवासी प्रवीण कुमार यादव दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे। गांव के बाहर बना उनका स्मारक आज भी उनकी शहादत की याद दिलाता है। तीन जून को जब उनके शहीद होने की सूचना आई तो हर आंख नम थी, लेकिन सीना गर्व से चौड़ा था। जिले का लाल देश के लिए जो शहीद हुआ था।
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कारगिल युद्घ में शहीद हुए अमरुद्दीन की प्रतिमा
- फोटो : अमर उजाला
बेवर के गांव घुटारा निवासी शहीद मुनीश कुमार यादव, कुरावली के नगला आंध्रा निवासी हेमचरन सिंह, किशनी के गांव दिवन्नपुर साहिनी निवासी अमरुद्दीन और घिरोर के गांव शाहजहांपुर निवासी पैरानायक सत्यदेव सिंह भी शामिल थे। 24 जुलाई 1999 को शहीद होने से पहले अकेले सत्यदेव सिंह ने 18 पाक सैनिकों को मार गिराया था। साथी सैनिकों ने जब ये बात परिजनों को बताई तो सत्यदेव की वीरता पर हर किसी को फक्र था। ये शहीद न केवल अपना बल्कि मैनपुरी का नाम भी इतिहास में हमेशा के लिए अमर कर गए।
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शहीद हेमचरन सिंह का फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
शहर से सटे गांव अंजनी निवासी प्रवीण कुमार यादव की शहादत के बाद भी युवाओं में सेना में जाने का जुनून कम नहीं हुआ। आज शायद ही ऐसा कोई घर हो, जिससे कोई बेटा सेना में न हो। पांच हजार की आबादी वाले गांव में लगभग सौ युवा सेना में सेवाएं दे रहे हैं। जबकि इतने ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं। सूरज के निकलने से पहले यहां सेना में भर्ती होने के लिए युवाओं की तैयारी शुरू हो जाती है। ये गांव जिले के लिए एक मिसाल है।
कारगिल युद्घ में शहीद हुए सत्यदेव सिंह का फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
शहीदों के परिवारों में आज भी कुछ बातों को लेकर कसक है। उनके बेटे ने देश पर अपनी जान कुर्बान कर दी, लेकिन शासन और प्रशासन ने अनदेखी कर दी। शहीद प्रवीन कुमार यादव के पुत्र अजय यादव कहते हैं कि कारगिल विजय दिवस पर भी कोई अधिकारी या जनप्रतिनिधि दो फूल चढ़ाने के लिए नहीं आता है। किशनी के गांव दिवन्नपुर साहिनी निवासी शहीद अमरुद्दीन की प्रतिमा के लिए प्रशासन ने जगह तक मुहैया नहीं कराई। बाद में खुद ही शहीद के परिवारों ने 17 दिन बाद उनकी मूर्ति लगवाई। कहीं न कहीं इन छोटी छोटी बातों का दर्द शहीद के परिवारों के दिल में चुभता है।