ताज को मोहब्बत की निशानी माना जाता है। शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में इसका निर्माण कराया था, जिसकी खूबसूरती की दुनिया दीवानी है। ताजमहल को भले मुमताज के नाम से जाना जाता हो, लेकिन इसमें केवल मुमताज महल का ही मकबरा नहीं, बल्कि शाहजहां की दो अन्य बेगमें भी इसी परिसर में दफन हैं।
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शाहजहां-मुमताज की कब्रों की प्रतिकृत
- फोटो : अमर उजाला
मुमताज मुख्य गुंबद में दफन शाहजहां के पास हैं तो पूर्वी गेट पर सरहिंदी बेगम का मकबरा है, जिन्हें इज्जुनिशां बेगम के नाम से जानते हैं। पश्चिमी गेट पर फतेहपुरी बेगम का मकबरा है। इन तीनों के अलावा चौथी बेगम खंदारी बेगम का मकबरा ताज के बाहर है। यह पूर्वी गेट के बाहर काली ( संदली) मस्जिद के पास है। ताज में नकली कब्रें सिर्फ शाहजहां और मुमताज की हैं, जो असली के साथ ही बनाई गई थीं।
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सुनहरा ताजमहल
- फोटो : अमर उजाला
इतिहासकार राज किशोर राजे के अनुसार अर्जुमंद बानो बेगम यानी मुमताज महल अल जमानी की 17 जून 1631 को मृत्यु के बाद शोक में डूबे शाहजहां ने यादगार मकबरा तामीर करने के लिए काम शुरू कराया। 1631 में ही ताजमहल की नींव रख दी गई। 22 जून 1632 को जब मुमताज महल का पहला उर्स मनाया गया, तब ताजमहल का लाल पत्थर का बेस तैयार हो चुका था, जिस पर टेंट लगाकर उर्स मनाया गया।
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ताजमहल का मुख्य गुंबद
- फोटो : अमर उजाला
10 साल में बना मुख्य मकबरा
26 मई 1633 को दूसरे उर्स में टेरेस और प्लेटफार्म बनाया जा चुका था। 10 साल में मुख्य गुंबद का काम पूरा कर लिया गया। शाहजहां की कहानी बादशाहनामा में इसका जिक्र है। 1643 में मुमताज महल की कब्र के चारों ओर सोने की जाली लगाई गई, जो मौजूदा संगमरमरी कब्र की तरह ही थी। मुख्य गुंबद का काम पूरा होने के बाद शाही मस्जिद और उसके सामने मेहमानखाना और अंत में रॉयल गेट, फोरकोर्ट का काम कराया गया।
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ताजमहल
- फोटो : Amar Ujala
अहमद लाहौरी का डिजाइन, अमानत खान की कैलीग्राफी
ताजमहल का डिजाइन उस्ताद अहमद लाहौरी ने तैयार कर शाहजहां को दिखाया। शिराज से अमानत खान को गुंबद पर केलीग्राफी का काम सौंपा गया। गयासुद्दीन ने मकबरे के पत्थर पर इबारतें लिखीं। तुर्की के गुंबद बनाने के शिल्पी इस्माइल खान अफरीदी को गुंबद बनाने की जिम्मेदारी दी गई। 20 हजार मजदूरों पर निगरानी के लिए मुहम्मद हनीफ को अधीक्षक बनाया गया।
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ताजमहल में शाहजहां-मुमताज के कब्रों की प्रतिकृति
- फोटो : Amar Ujala
112 साल पुराने फानूस से रोशन हैं कब्रें
ब्रिटिश वायसराय लार्ड कर्जन ने मिस्र की राजधानी काहिरा में फानूस देख उसी की तरह के फानूस बनवा कर 16 फरवरी 1908 को मुमताज की कब्र के ऊपर लगवाया। यह पीतल का बना हुआ है, लेकिन सोने और चांदी से मढ़ा गया था। एक साल बाद 1909 में लाहौर के मायो स्कूल आफ आर्ट से फानूस बनवाया गया, जिसे रॉयल गेट पर लगाया गया।
ताजमहल को निहारते विदेशी सैलानी
- फोटो : अमर उजाला
मुमताज को दफनाते वक्त शाहजहां मौजूद नहीं थे
इतिहासकार राज किशोर राजे बताते हैं कि बुरहानपुर से मुमताज का शव ताजमहल में लाकर पहले अस्थाई तौर पर दफनाया गया। शव लेकर उनका बेटा शाहशुजा आया था। सुपुर्द ए खाक किए जाते समय शाहजहां वहां मौजूद नहीं थे।