साढ़े सत्रह साल की उम्र में भारत आए और यहां शिमला के सनातन कॉलेज में दाखिला पाने वाले हामिद करजई अपनी पहली परीक्षा के सारे पेपर में फेल हो गए थे। लेकिन कॉलेज के प्रिंसिपल ने यह कहते हुए हौसला बढ़ाया कि ‘तुम्हें आता सबकुछ है, लेकिन इंग्लिश न आने की वजह से फेल हुए हो।’
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हामिद करजई
- फोटो : अमर उजाला
प्रिंसिपल ने उन्हें तीस रुपये की डिक्शनरी खरीदने के लिए कहा। गुरु के कहे अनुसार चले और तीन महीने कड़ी मेहनत करते हुए इतनी इंग्लिश सीखी कि न केवल परीक्षाएं पास करने के काबिल हुए, बल्कि एम्स में पढ़ रहे अपने भाई को भी प्रभावित किया। भारत में बीते अपने विद्यार्थी जीवन का यह प्रसंग बताते हुए हामिद करजई भावुक हो गए।
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हामिद करजई
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अमर उजाला व आईपीसीएस के कार्यक्रम ‘लिविंग हिस्ट्री’ की पहली कड़ी में करजई ने अपने व्याख्यान में ऐसे कई प्रसंग साझा किए विदेशी नागरिक के तौर पर हिमाचल में उन्हें पुलिस के पास पहुंचकर रजिस्ट्रेशन के लिए अपने पासपोर्ट पर मुहर लगवाना होता करजई ने बताया कि कॉलेज के पहले साल उन्होंने इस नियम का पालन किया, लेकिन फिर भारत के लोगों से मिले प्रेम ने उन्हें लापरवाह बना दिया।
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हामिद करजई
- फोटो : अमर उजाला
नतीजतन वे अपने पासपोर्ट पर मुहर लगवाने नहीं जाते। करजई ने बताया कि उनके प्रति पुलिस ने इतनी उदारता बरती कि तीसरे वर्ष जब कोर्स पूरा हो रहा था, पुलिस अधिकारी खुद उनके पास स्टांप लेकर आए और कहा ‘तुम तो नहीं आ रहे, लो हम ही आ गए’, और पासपोर्ट पर मुहर लगाई गई।
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हामिद करजई
- फोटो : अमर उजाला
करजई ने बताया कि शिमला में रहते हुए उन्होंने भारत के आजादी के आंदोलन को पढ़ा, महात्मा गांधी के मूल्यों से परिचित हुए और विश्व के लिए उनका महत्व समझ पाए। भारत ने उन्हें ऐसा व्यक्तित्व दिया, जिसकी वजह से वह खुद को अफगानिस्तान के मुश्किल हालात के लिए तैयार पाया।
उन्होंने बताया कि काबुल से दिल्ली पहुंचने पर उन्हें भारी गर्मी ने परेशान कर दिया। अपने परिचितों से बात की तो सुझाव मिला कि शिमला में ठंड है, वहां चले जाएं। वे अपने भाई के साथ शिमला पहुंचे और यहां के मौसम से ऐसे प्रभावित हुए कि यहीं आगे की पढ़ाई की।