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शार्दुल विहान: खिलौने से खेलने की उम्र में उठाई बंदूक, तड़के उठकर 150 किमी दूर जाकर करते थे अभ्यास

Thu, 23 Aug 2018 03:37 PM IST
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
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शार्दुल विहान
भारत के युवा निशानेबाज शार्दुल विहान ने एशियाई खेलों में देश का नाम रोशन कर दिया। 15 साल के निशानेबाज ने गुरुवार को डबल ट्रैप राइफल स्पर्धा में भारत को सिल्वर मेडल दिलाया। शार्दुल मौजूदा एशियाई खेलों में पदक जीतने वाले भारत के तीसरे सबसे युवा एथलीटों में से एक हैं। उनके साथ इस लिस्ट में सौरभ चौधरी और लक्ष्य शामिल हैं। शार्दुल को 7 साल की उम्र में राइफल चलाने का शौक लगा था। इसके पीछे की कहानी भी बेहद रोचक है। 
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शार्दुल विहान
दरअसल, शार्दुल जब 6 साल के थे तब उनके पिता दीपक विहान ने बेटे की खेल में रूचि को देखते हुए क्रिकेट क्लब में एडमिशन दिला दिया। करीब एक साल तक शार्दुल ने क्रिकेट क्लब में खेला। मगर उसने अपने पिता को कहा कि वह आगे क्रिकेट नहीं खेलना चाहता क्योंकि उसे फील्डिंग में सबसे पीछे खड़ा किया जाता है। इसके अलावा बल्लेबाजी और गेंदबाजी भी उसे सबसे आखिर में दी जाती है। बेटे की बात सुनकर पिता दीपक ने उसे बैडमिंटन कोच के पास भेज दिया।
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शार्दुल विहान
बैडमिंटन कोर्ट भी शार्दुल के घर से काफी दूर था। एक दिन शार्दुल को प्रैक्टिस पर पहुंचने में देरी हो गई। इसे देख कोच ने नन्हें शार्दुल को घर लौटा दिया। अगले दिन जब दीपक कोच से बात करने गए तो उन्हें कहा गया कि शार्दुल के लिए बैडमिंटन सही नहीं है। इसे किसी और खेल में भेजिए।

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शार्दुल विहान
शार्दुल जब 7 साल के थे तब पिता ने उन्हें राइफल एसोसिएशन के कोच वेदपाल सिंह से मिलवाया। कोच ने कहा कि शार्दुल की उम्र काफी कम है। इसे राइफल चलाने के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा। वैसे, अपने अधिक वजन के कारण शार्दुल उम्र में थोड़ा बड़ा दिखता है। कोच ने फिर भी शार्दुल को एक बार राइफल उठाकर निशाना लगाने का मौका दिया। 7 साल के लड़के ने बड़ी आराम से राइफल उठाई और निशाना लगा दिया। यह देख कोच दंग हुए और ट्रेनिंग देने के लिए राजी हो गए। यही से शार्दुल की जिंदगी पूरी तरह बदल गई।
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शार्दुल विहान
शार्दुल ने चार साल कोच वेदपाल से ट्रेनिंग ली। इसके बाद उन्होंने दिल्ली में ट्रेनिंग लेना शुरू किया। शार्दुल चूकी मेरठ के रहने वाले हैं। इसलिए वह रोज सुबह 4 उठकर मेरठ से दिल्ली यानी करीब 150 किमी की दूरी तय करके प्रैक्टिस करने आते थे। शार्दुल अपने चाचा के साथ सुबह चार बजे दिल्ली आता था क्योंकि उसके पिता अपने काम में व्यस्त होने की वजह से रोज दिल्ली का सफर तय नहीं कर सकते थे। 
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