36 साल की उम्र में अपना ही 12 साल पुराना वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़कर पैरालंपिक में फिर से गोल्ड जीतने वाले जेवलिन थ्रोअर देवेंद्र झांझरिया देश के सबसे सफल एथलीट बन गए हैं। ओलंपिक के बाद दिव्यांगों के लिए होने वाले पैरालंपिक्स खेलों में देवेंद्र की सफलता ने सभी को इस खेल की ओर आकर्षित किया है। आइए, जानते हैं देश के इस महानतम एथलीट के बारे में 9 खास बातें।
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2 वर्ल्ड रिकॉर्ड, 2 गोल्ड जीतने वाले देवेंद्र के बारे में जानें 9 खास बातें
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Devendra Jhajharia,
- फोटो : Getty
पहला, राजस्थान के चुरू में जन्मे जेवलिन थ्रोअर देवेंद्र झांझरिया के पास एक ही हाथ है, जबकि उनका दूसरा हाथ कुहनी (बायां हाथ) तक ही है। पैरालंपिक खेलों में उनके पास 14 साल का अपार अनुभव है।
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Devendra Jhajharia
- फोटो : Reuters
दूसरा, जन्म के समय देवेंद्र झांझरिया सामान्य बच्चों की तरह ही पैदा हुए थे, लेकिन आठ साल की उम्र में खेल के दौरान वह पेड़ पर चढ़े, इस बीच उनका बायां हाथ 11 हजार वोल्ट वाले बिजली के तार की चपेट में आ गया जिससे उनके शरीर का काफी हिस्सा जल गया। तब किसी ने नहीं सोचा था कि वह फिर से उठ खड़े होंगे, लेकिन वह आगे बढ़े और कामयाब भी हुए। हालांकि बाद में बाएं हाथ की कुहनी तक का हिस्सा हटाना पड़ा था।
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तीसरा, देवेंद्र झांझरिया जब 10वीं में थे तो उन्होंने भाला फेंक को खेल के रूप में चुना। इस समय वह पूरी तरह से फिट हो चुके थे। उन्होंने अपना अभ्यास जारी रखा और पहले वह ओपन कैटेगरी में जिला स्तर पर चैंपियन बने। वह कई सालों तक सामान्य बच्चों के साथ खेलते रहे और पदक जीतते रहे। उन्हें पैरा यानि दिव्यांगों के लिए अलग से खेल के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।
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चौथा, पैरालंपिक में 2 स्वर्ण जीतने वाले देवेंद्र झांझरिया पहले रेलवे के लिए काम करते थे, लेकिन अब वह भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के साथ काम कर रहे हैं। उन्होंने द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता आरडी सिंह के साथ अपने खेल को संवारा और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे। आरडी सिंह ने ही पैरा खेलों से देवेंद्र को अवगत कराया।
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पांचवां, देवेंद्र उस समय चर्चा में आए थे जब 2004 में एथेंस पैरालंपिक खेलों में F46 जैवलिन स्पर्धा में गोल्ड मेडेल जीता था। उस दौरान उन्होंने भाला फेंक में गोल्ड मेडल जीतने के लिए 62.15 मीटर दूसर भाला फेंक कर वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बनाया था। तब वह भारत के लिए इस खेल में गोल्ड जीतने वाले दूसरे एथलीट थे।
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छठा, देवेंद्र ने 12 साल बाद ठीक उसी खेल (रियो) में अपने पुराने वर्ल्ड रिकॉर्ड को ध्वस्त करते फिर से गोल्ड मेडल पर कब्जा जमा लिया। इस बार उन्होंने 2 मीटर ज्यादा दूर भाला फेंकते हुए 63.97 मीटर दूर फेंककर स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया है।
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सातवां, 2004 में वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाकर गोल्ड जीतने वाले देवेंद्र झांझरिया ने 2013 में ल्योन में आईपीसी वर्ल्ड चैंपियनशिप में चैंपियनशिप रिकॉर्ड बनाते हुए गोल्ड मेडल जीता था। 2015 में दोहा में वह सिल्वर जीतने में कामयाब रहे थे।
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आठवां, 2004 में एथेंस में वर्ल्ड रिकॉर्ड के साथ गोल्ड मेडल जीतने वाले देवेंद्र को इस ऐतिहासिक प्रदर्शन के बाद भी कोई खास सम्मान नहीं मिला। आर्थिक मदद भी उनके खाते में नहीं आई। उन्होंने एथेंस जाने से पहले छोटी सी ट्रेनिंग ही ली थी और मूलभूत सुविधाओं के बिना ही पैरालंपिक में हिस्सा लिया और गोल्ड जीता था। अब उन्हें सरकार और निजी कंपनियों से मदद मिल रही है।
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रियो ओलंपिक
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नौवां, देवेंद्र भारत के पहले ऐसे पैरा-एथलीट हैं जिन्हें पद्म सम्मान मिला। उन्हें 2012 में पद्मश्री से नवाजा गया था। इसके 2 साल बाद 2014 में उन्हें फिफ्की की ओर से साल के सर्वश्रेष्ठ पैरालंपिक एथलीट के अवार्ड से सम्मानित किया गया था।