कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में महिला शॉट पुट F57 स्पर्धा का स्वर्ण जीतने वाली शर्मिला धनखड़ ने सिर्फ एक पदक नहीं जीता, बल्कि संघर्षों पर जीत की ऐसी मिसाल पेश की, जो लाखों लोगों को प्रेरित करती है। पोलियो, गरीबी, घरेलू हिंसा और आर्थिक तंगी जैसी मुश्किलों का सामना करने वाली हरियाणा की इस खिलाड़ी ने आखिरकार इतिहास रचते हुए भारत को पैरा एथलेटिक्स का पहला कॉमनवेल्थ गेम्स स्वर्ण पदक दिलाया।
ग्लासगो में शॉट पुट इवेंट में जब 40 वर्षीय शर्मिला धनखड़ का 9.81 मीटर का थ्रो जमीन पर गिरा तो वह सिर्फ एक दूरी नहीं थी, बल्कि वर्षों के दर्द, संघर्ष, अपमान और उम्मीदों की कहानी थी। इसी थ्रो के साथ उन्होंने महिला शॉट पुट F57 स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वह कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में पैरा एथलेटिक्स में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली खिलाड़ी बन गईं। इतना ही नहीं, उन्होंने 20 साल बाद भारत को पैरा एथलेटिक्स में पदक भी दिलाया, लेकिन इस स्वर्ण पदक तक पहुंचने का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। पीएम मोदी ने भी शर्मिला को बधाई दी है। आइए शर्मिला की प्रेरक और भावुक कर देने वाली कहानी के बारे में जानते हैं...
गरीबी में बीता बचपन, पोलियो ने छीनी बचपन की रफ्तार
हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के छोटे से गांव चित्रौली में जन्मी शर्मिला का बचपन अभावों में बीता। उनके पिता एक छोटे किसान थे और मां दृष्टिबाधित थीं। घर में तीन बेटियां थीं और बेहद सीमित संसाधनों में परिवार का गुजारा होता था।
महज दो साल की उम्र में शर्मिला पोलियो की शिकार हो गईं। इलाज की पर्याप्त सुविधा नहीं मिलने के कारण उनका एक पैर हमेशा के लिए प्रभावित हो गया। यह वही उम्र थी, जब बच्चे चलना और दौड़ना सीखते हैं, लेकिन शर्मिला के हिस्से में संघर्ष आ गया।
शर्मिला ने एक बार अपने जीवन के बारे में कहा था, 'मेरी मां दृष्टिबाधित हैं, पिता किसान थे और हमारे पास गुजारा करने के लिए बहुत कम साधन थे। जिंदगी कभी आसान नहीं रही।'
शर्मिला ने पदक जीतने के बाद कहा, 'मैं यह पदक अपनी मां को समर्पित करूंगी। हर तरफ से आलोचनाओं के बावजूद, वह बचपन से ही मेरा समर्थन कर रही हैं। मैं बहुत खुश हूं कि मैंने अपनी मां का सपना पूरा कर दिया।'
शर्मिला ने कहा, 'हम बहुत खुश हैं। हम अपने देश के लिए पदक जीतना जारी रखेंगे। हम कड़ी मेहनत करना जारी रखेंगे। हम अगले राष्ट्रमंडल खेलों के लिए अच्छी तैयारी करेंगे। यह हमारे पैरा-एथलेटिक्स का पहला स्वर्ण पदक है।'
शर्मिला की शादी दसवीं की परीक्षा के तुरंत बाद कर दी गई। लेकिन यह रिश्ता उनके लिए दर्द और यातना लेकर आया। उन्होंने वर्षों तक घरेलू हिंसा झेली। अपने जीवन के सबसे कठिन दौर को याद करते हुए उन्होंने कहा, 'एक रात मेरे पहले पति ने रात 11 बजे से सुबह तीन बजे तक मेरी पिटाई की और फिर घर से निकाल दिया। उसके बाद मैं कभी वापस नहीं गई।'
दो छोटी बेटियों के साथ मायके लौटना आसान नहीं था। परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर थी। ऐसे में उन्होंने घर चलाने के लिए महिलाओं के अस्पताल में सफाईकर्मी, घरेलू सहायक और सुरक्षा गार्ड तक का काम किया। कम आमदनी थी, लेकिन इसी काम ने उन्हें मानसिक रूप से टूटने नहीं दिया।
STORY | CWG: Sharmila wins historic gold in para athletics as India shines with multiple medals
Sharmila Dhankar scripted history by becoming India's first-ever Commonwealth Games para-athletics gold medallist, while high jumper Sarvesh Kushare and weightlifters Valluri Ajaya… pic.twitter.com/U9kMZhsR7R
दूसरी शादी बनी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट
28 साल की उम्र में शर्मिला ने दूसरी शादी की। इस बार किस्मत ने उनका साथ दिया। उनके पति अजीत सिंह ने उन्हें कभी कमजोर नहीं समझा। उन्होंने शर्मिला को पैरा खेलों में हाथ आजमाने के लिए प्रेरित किया। 34 साल की उम्र में शर्मिला ने पहली बार पैरा एथलेटिक्स की ट्रेनिंग शुरू की। यह वही उम्र होती है, जब कई खिलाड़ी अपने करियर के आखिरी दौर में होते हैं, लेकिन शर्मिला के लिए यहीं से नई जिंदगी की शुरुआत हुई। कोच टेकचंद और देवेंद्र के मार्गदर्शन में उन्होंने 2021 पैरा नेशनल चैंपियनशिप में राष्ट्रीय रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक जीतकर सबका ध्यान खींचा।
घर बेचकर पूरा किया सपना
खेलों में आगे बढ़ने के लिए सिर्फ मेहनत ही नहीं, पैसे की भी जरूरत थी। लेकिन आर्थिक तंगी बार-बार रास्ता रोक रही थी। आखिरकार 2023 में परिवार ने रेवाड़ी स्थित अपना घर बेच दिया और किराये के मकान में रहने लगा, ताकि शर्मिला अपने प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं का खर्च उठा सकें। उन्होंने कहा, 'खेल ने मुझे दूसरा जीवन दिया है। इस साल कॉमनवेल्थ और एशियाई पैरा खेलों में पदक जीतने के बाद मेरा सपना फिर से अपना घर खरीदने का है।'
2022 के बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में शर्मिला चौथे स्थान पर रही थीं। 2023 के एशियाई पैरा खेलों में भी वह पदक से चूक गईं। विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भी पांचवें स्थान पर रहीं। लेकिन उन्होंने हार को मंजिल नहीं बनने दिया।
ग्लासगो में उन्होंने अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 9.81 मीटर का थ्रो फेंका और स्वर्ण पदक जीत लिया। उनके स्वर्ण के कुछ देर बाद नाइजीरिया की खिलाड़ी के अयोग्य घोषित होने पर भारत की शिल्पा के. शायला को कांस्य पदक मिला। इस तरह भारत ने पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स की किसी पैरा एथलेटिक्स स्पर्धा में डबल पोडियम फिनिश हासिल की।
अब बेटियों के सपनों को उड़ान देना चाहती हैं
शर्मिला कहती हैं कि उनकी सबसे बड़ी जीत सिर्फ यह स्वर्ण पदक नहीं, बल्कि अपनी दोनों बेटियों का भविष्य है। बड़ी बेटी अंजू अंडर-16 जेवलिन थ्रो खिलाड़ी हैं, जबकि छोटी बेटी लक्ष्मी अंडर-14 लंबी कूद में हिस्सा लेती हैं। उनकी ख्वाहिश है कि उनकी बेटियों को वह संघर्ष कभी न झेलना पड़े, जो उन्हें झेलना पड़ा।
शर्मिला धनखड़ की कहानी यह साबित करती है कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर हौसला जिंदा हो तो मंजिल एक दिन जरूर मिलती है। ग्लासगो का स्वर्ण पदक उनके गले में जरूर चमक रहा है, लेकिन उसकी असली चमक उन वर्षों की मेहनत, आंसुओं और अदम्य साहस से निकली है, जिसने उन्हें भारत की नई 'गोल्डन गर्ल' बना दिया।