त्रिमूर्ति में भगवान शिव का स्थान
- फोटो : Adobe stock
सृष्टि का चक्र और शिव
ब्रह्मांड में सब कुछ जन्म/विकास, वृद्धि, क्षय और अंत में विनाश के अधीन है और ये चक्र बार-बार दोहराते रहते हैं। विनाश भी दैवीय लीला का हिस्सा है और इसका श्रेय भगवान शिव को दिया जाता है। भगवान शिव को गहन धार्मिक ज्ञान से जोड़ा जाता है।
त्रिमूर्ति में भगवान शिव का स्थान
भगवान शिव हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में से एक हैं, जो ब्रह्मा और विष्णु के साथ पवित्र त्रिमूर्ति का हिस्सा हैं। ब्रह्मा को सृष्टिकर्ता और विष्णु को रक्षक माना जाता है, जबकि शिव को रूपांतरणकर्ता या संहारक के रूप में जाना जाता है। लेकिन भ्रमवश हम नहीं जानते कि शिव के संदर्भ में संहार का अर्थ नकारात्मक नहीं है। इसका अर्थ है उन चीजों को हटाना जो अब हमारे लिए उपयोगी नहीं हैं, ताकि नई शुरुआत के लिए जगह बन सके। जैसे एक माली सूखे पत्तों को हटाकर नए पत्ते उगाता है, उसी प्रकार शिव नकारात्मकता, अहंकार और अज्ञान को नष्ट करके ज्ञान और विकास के लिए स्थान बनाते हैं। इसीलिए उन्हें रूपांतरण का देवता भी कहा जाता है। क्योंकि धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि 'धारण करने योग्य' (मानवीय, नैतिक और सामाजिक कर्तव्यों) का पालन करना है, जो मानव के मानसिक, आध्यात्मिक विकास तथा भौतिक कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। यह व्यक्ति में सद्गुण विकसित कर, निस्वार्थ सेवा, एकता, शांति और सामाजिक सामंजस्य के माध्यम से सच्चा सुख (अभ्युदय) प्रदान करता है।