गिरीश चाचा मोहल्ले के सबसे दरियादिल इंसान थे। शायद ही मोहल्ले में कोई हो, जो उन्हें न जानता हो। अगर किसी को मदद की जरूरत हो, तो अपनी जान उस पर न्यौछावर कर देते थे। वहीं मोहल्ले में एक नौटियाल साहब भी थे, जिन्हें गिरीश चाचा से हमेशा शिकायत रहती थी कि वह मोहल्ले के निकम्मे लड़कों को बढ़ावा देते हैं। एक दिन जब गिरीश चाचा कुछ सामान लेकर लौट रहे थे, तो रास्ते में उनकी मुलाकात नौटियाल साहब से हुई। मिलते ही नौटियाल साहब ने उन पर ताना कसा, क्यों चाचा, आपके शागिर्द कहां गए आज। इतना भारी समान आप अकेले उठा रहे हैं।
गिरीश चाचा बोले, जरूर कहीं अपने कामों में लगे होंगे। नौटियाल साहब बोले, खाक कामों में लगे होंगे। मै जानता हूं, सब एक नंबर के निकम्मे हैं। नौटियाल साहब ने अपने साथ आ रहे दो लड़कों की तरफ इशारा करते हुए कहा, देखिए, इन बेमिसाल लड़कों को। इनकी नौकरी मैंने लगवाई है। जैसे ही इन्होंने मुझे देखा, ये दोनों मेरा सामान उठाने के लिए आ गए। कर्मठ लड़के हैं न, आपके उन निकम्मे लड़कों से कई गुना ज़्यादा अच्छे। तभी उसमें से एक लड़के ने कहा, नौटियाल अंकल, आपने मेरी नौकरी एक दर्जी की दुकान पर लगवाई थी, लेकिन उसके दूसरे ही दिन मैंने वह नौकरी छोड़ दी, क्योंकि वह काम मुझे पसंद नहीं था।
गिरीश चाचा ने ही मुझे समझाया कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। तभी आज मेरे काम और मेरे हुनर को पूरा मोहल्ला जान पाया। दूसरा लड़का भी बोल पड़ा, एक दिन गिरीश चाचा सामान लिए जा रहे थे, जब मैंने उनकी मदद करनी चाही, तो बोले, मैं अपना सामान उठाने में सक्षम हूं। मुझे मदद की जरूरत नहीं। अगर तुम्हें मदद करनी ही है, तो हर उस बुजुर्ग की मदद करना, जो यहां से भारी सामान उठाए जाते दिखे। नौटियाल साहब का मुंह देखने वाला था। गिरीश चाचा बोले, मैं किसी को उपदेश नहीं देता। मैं बस वह बनके दिखाता हूं।
हरियाली और रास्ता से साभार