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Chanakya Niti: आचार्य चाणक्य के ये श्लोक आपको हमेशा रखेंगे दूसरों से 4 कदम आगे

Tue, 29 Mar 2022 10:15 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमरउजाला, नई दिल्ली
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आचार्य चाणक्य ने अपनी नीतियों से हमेशा समाज का मार्गदर्शन किया है। - फोटो : अमर उजाला
Chanakya Niti: आचार्य चाणक्य एक श्रेष्ठ विद्वान होने के साथ एक अच्छे शिक्षक भी माने जाते हैं। आचार्य चाणक्य विश्वप्रसिद्ध तक्षशिला विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण की और वहीं पर आचार्य के पद पर विद्यार्थियों का मार्गदर्शन भी किया था। वे  न सिर्फ एक कुशल कूटनीतिज्ञ बल्कि एक महान रणनीतिकार और अर्थशास्त्री भी थे। आचार्य चाणक्य ने अपने जीवन में विषम से विषम परिस्थितियों का सामना किया था परंतु कभी हार नहीं मानी और अपने लक्ष्य को प्राप्त किया। अगर कोई व्यक्ति की आचार्य चाणक्य की बातों का अनुसरण अपने जीवन में करता है, तो वह जीवन में कभी गलती नहीं करेगा और सफल मुकाम पर पहुंच सकता है। आचार्य चाणक्य ने अपनी नीतियों से हमेशा समाज का मार्गदर्शन किया है। चाणक्य नीति के अनुसार प्रत्येक मनुष्य जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहता है। उसकी कामना रहती है सुख-समृद्धि, धन और वैभव सदैव बना रहे। आचार्य चाणक्य की चाणक्य नीति के ये श्लोक बहुत महत्वपूर्ण है. इनके बारे में आइए जानते हैं-
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मनुष्य को अपने व्यवहार में बहुत ही भोलापन या सीधापन नहीं दिखाना चाहिए। - फोटो : अमर उजाला
नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम् ।
छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः ॥


अर्थ- मनुष्य को अपने व्यवहार में बहुत ही भोलापन या सीधापन नहीं दिखाना चाहिए। ध्यान रहे वन में जो सीधे पेड़ पहले काटे जाते हैं, और जो पेड़ टेढ़े हैं वो खड़े रहते हैं ।
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अपने ऊर्जा स्रोत पर गौर जरूर करें, भविष्य में यही काम आएंगे।  - फोटो : अमर उजाला
कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ ।
कश्चाहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ॥

 
अर्थ- सही समय, सही मित्र, सही ठिकाना, पैसे कमाने के सही साधन, पैसे खर्चा करने के सही तरीके और अपने ऊर्जा स्रोत पर गौर जरूर करें, भविष्य में यही काम आएंगे। 

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जब भी कोई निर्णय लें तो सही और गलत की परख अवश्य करें।  - फोटो : अमर उजाला
यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते ।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति चाध्रुवं नष्टमेव हि ॥ 


अर्थ- जो मनुष्य निश्चित यानी सही को छोड़कर अनिश्चित यानी गलत का सहारा लेता है, उसका सही भी नष्ट हो जाता है। इसलिए जब भी कोई निर्णय लें तो सही और गलत की परख अवश्य करें। 
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श्रेठ व्यक्ति संकटों का पहाड़ टूटने पर भी श्रेठ मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करता। - फोटो : अमर उजाला
प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः ।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः ॥


अर्थ- जिस सागर को हम इतना गम्भीर समझते हैं, प्रलय आने पर वह भी अपनी मर्यादा भूल जाता है और किनारों को तोड़कर जल-थल एक कर देता है; परन्तु साधु अथवा श्रेठ व्यक्ति संकटों का पहाड़ टूटने पर भी श्रेठ मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करता।
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किसी भी व्यक्ति को उसके पद के आधार पर सर्वश्रेष्ठ नहीं माना जा सकता है। - फोटो : amar ujala
गुणैरुत्तमतां याति नोच्चैरासनसंस्थितः।
प्रासादशिखरस्थोऽपि काकः किं गरुडायते॥ 


अर्थ- मनुष्य सर्वश्रेष्ठ या उत्तम तभी बनता है जब उसके गुण उत्तम होते हैं । किसी भी व्यक्ति को उसके पद के आधार पर सर्वश्रेष्ठ नहीं माना जा सकता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कौआ महल के शिखर पर बैठकर गरुड नहीं बन जाता। 
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विद्या को एक गुप्त धन कहा जाता है। - फोटो : amar ujala
कामधेनुगुना विद्या ह्यकाले फलदायिनी।
प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम्॥


अर्थ- विद्या अर्जन करना यह एक कामधेनु के समान है जो हर मौसम में अमृत प्रदान करती है। वह विदेश में माता के समान रक्षक अवं हितकारी होती है। इसीलिए विद्या को एक गुप्त धन कहा जाता है।
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