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आस्था एवं विश्वास को समेटे हुए है वागड़ का यह उत्सव

Fri, 08 Sep 2017 12:12 PM IST
amarujala.com- Presented by: विनोद शुक्ला
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देश में त्यौहारों की अपनी संस्कृति है। हर क्षेत्र किसी न किसी खास त्यौहार एवं उत्सव के लिए जाना जाता है। एक उत्सव ऐसा भी है जहां पर भगवान के रथ को कंधों पर उठाया जाता है। कंधों पर रथ उठाकर चलने एवं बीच बीच दौडऩे की झलक लोगों को मंत्रमुग्ध करती है। रथ को जनजाति समुदाय के लोग पीढिय़ों से उठाते हुए आये है। जैन समुदाय के इस पर्व के प्रति जनजाति समुदाय की गहरी आस्था है। वैसे यह उत्सव राजस्थान के समूचे वागड़ क्षेत्र में मनाया जाता है, लेकिन खास तौर पर पड़ोसी गुजरात राज्य से सटे पीठ गांव में मनाया जाता है। 
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रथोत्सव का यह पर्व सदियो से चला आ रहा है। काष्ठ का 200 वर्ष पुराना रथ देखकर हर कोई हैरत हो जाता है। भारी भरकम दो मंजिला रथ की कारीगरी बेहद अद्भूत है। रथ पर ऐरावत हाथी, घोड़े, ढोल बजाते, मृदंग बजाते युवक, राजा का दरबार के साथ काष्ठ की विभिन्न कलाकृतियां वागड़ की समृद्धि का दर्शन कराती है। इस रथ को 200 वर्ष जैन समाज के पूर्वजों ने वागड़ केे ही सेमलिया गांव के भोगीलाल सुथार की मदद से तैयार कराया था। इसे तैयार करने में लंबा समय लगा था। रथ की कारीगरी पीढिय़ों से इस पर्व को खास बनाती आ रही है। 
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पीठ का रथोत्सव अपने साथ सर्व धर्म सम्भाव का उदाहरण लिए चलता है। भगवान का रथ वर्ष में एक बार बाहर निकाला जाता है। इसे जनजाति समुदाय के आठ परिवार, उनके संबंधी ही पीढिय़ों से रथ को कंधों पर उठाकर चलते है। इसके लिए जैन समुदाय की तरफ से आमंत्रित किया जाता है। कंधों पर रथ उठाकर चलने एवं दौडऩे की एक झलक पाने के लिए लोगों की कतार लग जाती है। इस दौरान रथ का स्वागत अक्षत, पुष्प एवं श्रीफल के तोरण से किया जाता है। रथ की सेवा पूजा का कार्य एक ही परिवार के सेवक पीढिय़ों से करते आ रहे हैं।  

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अमर उजाला संवाददाता सिद्धार्थ शाह ने गांव के 85 वर्षीय शिक्षाविद तखतसिंह शक्तावत से बातचीत में पता चला कि राजा महाराजा के समय से रथोत्सव मेला लग रहा है। रथ को कंधों पर धारण करने, मंदिर से आगे बढ़ाने के दौरान ठाकुर परिवार को आमंत्रित किया जाता है। रथ का श्रृंगार उनकी मौजुदगी में होता है। पुराने समय में जागीरदार संग्राम सिंह अपने दल बल के साथ आते थे। रथ का श्रृंगार किया जाता था। गुलाल उड़ाकर रथ को आगे बढ़ाया जाता था। 70 वर्ष पूर्व जैन समाज के लोग अंगरखी वेशभुषा पहन कर मृदंग व ओबरी के भवाई वाद्य यंत्र की धूनों पर पर गैर नृत्य करते थे।
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पर्यूषण पर्व की समाप्ति के साथ ही भाद्रपक्ष के दिन प्राचीन काष्ठ के रथ को भण्डार गृह से शुभ मुहुर्त में बाहर निकाल जाता है। उसके पश्चात रात्रि को सोने-चांदी की आभूषणों से श्रृंगारित कर, चार दिशा में भगवान की प्रतिमा को विराजित किया जाता है। उसके बाद बीज के दिन दोपहर में भव्य शोभायात्रा निकाल जाती है। शाम को रावले में रथ को विराजमान किया जाता है। रात्रि को विविध कार्यक्रम के बाद अगले दिन तडक़े भंडारा किया जाता है।
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कहा जाता है कि काष्ठ निर्मित रथ के दर्शन करने से मनोकामना अवश्य पूरी होती है। जैन समाज जिसे रथ कहता है, उसे जनजाति समुदाय देव रवाडी के नाम से पूजते है। यहां पर मनोकामना धारण करने एवं छोडऩे के लिए लोगों का जमावड़ा रहता है। काष्ठ निर्मित मनोकामना वाले रथ को ३६ घंटे दर्शनार्थ रखा जाता है। लोगों का मानना है कि यहां पर मनोकामना धारणा के साथ कष्टो का निवारण हुआ है।

.....सिद्धार्थ शाह
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