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तुलसी विवाह 31 अक्टूबर को, जानिए क्यों शुरू होते हैं इस दिन से सारे शुभ कार्य

Sun, 29 Oct 2017 08:30 AM IST
amarujala.com- Presented by: विनोद शुक्ला
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अक्टूबर माह के अंतिम दिन यानी 31 तारीख, मंगलवार कार्तिक शुक्ल की एकादशी को देवउठनी एकादशी मनाई जाएगी। भगवान विष्णु इस दिन चार महीने तक सोने के बाद जागेंगे और इसी के साथ शुभ कार्यो की शुरूआत हो जाएगी। देवउठनी एकादशी के ही दिन भगवान विष्णु के एक स्वरूप शालीग्राम से तुलसी के पौधे का विवाह भी होता है। मान्यता है क‌ि तुलसी और व‌िष्‍णु के शाल‌िग्राम रूप का व‌िवाह करवाने वाले को कन्यादान का पुण्य प्राप्त होता है और अपार पुण्य की प्राप्त‌ि होती है। इसल‌िए देव प्रबोधनी एकादशी को तुलसी व‌िवाह उत्सव का द‌‌िन भी कहा जाता है। इस द‌िन को व‌िवाह का अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है यानी इस द‌िन ब‌िना पंचांग देखे व‌िवाह कार्य संपन्न क‌िया जा सकता है।

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तुलसी व‌िवाह से व‌िवाह की शुरुआत के पीछे के रहस्य को जानने से पहले पुराणों में पाप नष्ट होने का अर्थ भी जान लीज‌िए क्योंक‌ि आमतौर पर पाप नष्ट होने से यह माना जाता है क‌ि आप सारे अपराधों से मुक्त हो गए। लेक‌िन व‌िष्‍णु पुराण में पाप मुक्त होने के बारे में कुछ और ही बताया गया है। विष्णु पुराण के अनुसार पाप से मुक्त होने का अर्थ उस के संस्कारों से मुक्त होना है। किए गए पापों का परिणाम तो भुगतना ही है, उन्हें भुगतते हुए अपना इस तरह परिष्कार करना है कि पिछले कर्मों को दोहराने की जरूरत ही न पड़े।
 
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शास्‍त्रों का मत है क‌ि भगवान विष्णु समस्त मांगलिक कार्यों के साक्षी हैं। उनके विश्राम में रहते शुभ कार्य बंद रखें जाते है। समस्त शुभ कार्य  विष्णु के जाग्रत रहते हुए ही किए जाना चाहिए। विष्णु के जागने का दिन कार्तिक शुक्ल एकादशी है। इसी दिन से सभी शुभ कार्य, विवाह, उपनयन आदि शुभ मुहूर्त देखकर प्रारंभ किए जाते हैं।

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चार माह तक विश्राम करने के बाद, कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन विष्णु के स्वरुप शालिग्राम और तुलसी के मिलन का पर्व तुलसी विवाह कार्तिक शुक्ल एकादशी को रचाया जाता है। तुलसी विवाह विशुद्ध मांगलिक और आध्यात्मिक प्रसंग है। तुलसी को विष्णु प्रिया भी कहते हैं। कहते है कि देवता जब जागते हैं, तो सबसे पहली प्रार्थना तुलसी की ही सुनते हैं। तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आह्वान। कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी को तुलसी पूजन का उत्सव मनाया जाता है।
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मंडप, वर पूजा, कन्यादान, हवन और फिर प्रीतिभोज, सब कुछ पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ निभाया जाता है। इस विवाह में शालिग्राम वर और तुलसी कन्या की भूमिका में होती है। इस व‌िवाह और पूजन का संबंध इन बातों से है क‌ि सभी कार्यों में तुलसी का पत्ता अनिवार्य माना गया है। प्रतिदिन तुलसी में जल देना तथा उसकी पूजा करना अनिवार्य माना है। तुलसी घर-आंगन के वातावरण को सुखमय तथा स्वास्थ्य वर्धक बनाती है। 
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