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Krishna Janmashtami: कौन थी पूतना जिसका स्तनपान कर प्रभु ने हर लिए थे प्राण? जानिए श्रीकृष्ण बाललीला की यह कथा

Thu, 18 Aug 2022 12:13 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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पूतना वध की कथा - फोटो : Social media
भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व जन्माष्टमी, भाद्रपद के कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। भगवान कृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था, यही कारण है कि अष्टमी की तिथि को रात 12 बजे विशेष पूजा-अर्चन के साथ हर वर्ष यह उत्सव मनाया जाता है। ज्योतिषविदों का मानना है कि इस वर्ष अष्टमी तिथि 18 अगस्त को रात 9 बजकर 20 मिनट से शुरू होकर अगले दिन यानी 19 अगस्त को रात 10 बजे तक रहेगी, ऐसे में 18 अगस्त को कृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाएगा। भक्त इस दिन अपनी श्रृद्धानुसार, पूजा-पाठ और व्रत रखकर भगवान को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं।

मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं को सुनना और पढ़ना कई प्रकार की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला होताहै। पूतना वध की कथा, प्रभु की लीलाओं में काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। पूतना राक्षसी, कंस की दासी थी, जिसे कंस ने भगवान कृष्ण के मारने के लिए गोकुल भेजा था। उसके पास रूप बदलने की शक्ति थी, आइए जानते हैं कि कैसे पूतना ने रूप बदलकर भगवान कृष्ण को मारना चाहा और उसका किस तरह से अंत हुआ?
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वामन देव और राजा बलि की कहानी - फोटो : Twitter
पूतना के पूर्व जन्म की कथा

धर्मग्रंथों के अनुसार भले ही पूतना राक्षसी थी, पर उसका यह रूप श्राप या कहें उसके उद्धार के लिए हुआ था। पूर्वजन्म में वह राजा बलि की बेटी रत्नमाला थी। जब भगवान वामन रूप में राजा बलि से दान लेने पहुंचे तो रत्नमाला उनके सौंदर्य पर मोहित हो गई। उसने मन ही मन विचार किया कि काश मेरे भी कोई ऐसा पुत्र होता जिसे मैं ह्रदय से लगाकर स्तनपान करा पाती। 
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कृष्ण की छवि अलौकिक - फोटो : iStock
जब वामन भगवान ने विशाल रूप लेकर बलि राजा का सर्वस्व दान करा लिया तो रत्नमाला ने क्रोधित भाव से सोचा कि अगर ऐसा पुत्र होता भी, तो मैं उसे दुग्ध में विष देकर मार देती। भगवान उसके मन की बात समझ गए और तथास्तु बोलकर अंतर्ध्यान हो गए।

इसे श्राप कहें या वरदान, रत्नमाला अगले जन्म में पूतना हुई और अपने वरदान को पूर्ण करने के लिए प्रभु ने ऐसी लीला रची।

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जन्माष्टमी: बाल कृष्ण लीला - फोटो : अमर उजाला
बाल कृष्ण को मारने पहुंची पूतना

कंस को भय था कि देवकी की आठवीं संतान उसका बध कर देगा, इसी से बचने के लिए उसने भगवान कृष्ण को मारने के लिए पूतना को गोकुल में भेजा। पूतना ने  सुंदरी का रूप बनाकर गोकुल में प्रवेश किया। कृष्ण को ढूंढते हुए वह नंद भवन में पहुंच गई। मां यशोदा से बाल कृष्ण को मनुहार करने की आज्ञा लेकर उसने श्रीकृष्ण को अपनी गोद में उठाकर स्तनपान कराना शुरू किया। उसने स्तन में पहले से ही विष लगाया था, प्रभु इस छल को भली-भांति जानते थे, फिर भी उन्होंने स्तनपान जारी रखा।

 
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मां यशोदा और कृष्ण - फोटो : file photo
भगवान ने दुग्ध के साथ पूतना के प्राण भी पीने शुरू कर लिया। जान जाती देख पूतना अपने विकराल रूप में आ गई और नंदग्राम से दूर भागने लगी। प्रभु ने स्तनपान जारी रखा और दुग्ध के साथ राक्षसी के प्राण भी पी गए। इस प्रकार भगवान ने पूतना का उद्धार किया।

भगवान कृष्ण के बाल्य काल की यह कथा काफी रोचक है। बाद में मां यशोदा ने कृष्ण को पूतना के शरीर से अलग कर स्नान-दान कराया जिससे इस तरह की बाधाएं बाल कृष्ण पर दोबारा न आने पाएं।
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