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Sawan 2023: शिवजी को क्यों प्रिय हैं त्रिशूल, चन्द्रमा, डमरू, नाग, नंदी, त्रिपुंड और नंदी? जानें इनका महत्व

Sat, 24 Jun 2023 10:57 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

भगवान शिव का स्मरण करने मात्र से मन में जो एक छवि उभरती है वो एक वैरागी पुरुष की होती है। इनके एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे हाथ में डमरु, गले में सर्प माला, सिर पर त्रिपुंड चंदन लगा हुआ है।
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sawan 2023: श्रावण मास में शिव पूजा विशेष रूप से फलदाई है। भोले भंडारी थोड़ी सी भक्ति करने से जल्दी ही प्रसन्न होकर अपने भक्तों की मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं। - फोटो : अमर उजाला
धर्मग्रंथों में कहा गया है कि-'श्रावणे पूजयेत शिवम्'। अर्थात श्रावण मास में शिव पूजा विशेष रूप से फलदाई है। भोले भंडारी थोड़ी सी भक्ति करने से जल्दी ही प्रसन्न होकर अपने भक्तों की मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं। एक श्लोक के अनुसार 'वेदः शिवः,शिवः वेदः'अर्थात वेद ही शिव हैं और शिव ही वेद हैं। काल के भी महाकाल भगवान शिव के बारे में लिखा है कि- 'सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रूद्र की आत्मा हैं'।

भगवान शिव का स्मरण करने मात्र से मन में जो एक छवि उभरती है वो एक वैरागी पुरुष की होती है। इनके एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे हाथ में डमरु, गले में सर्प माला, सिर पर त्रिपुंड चंदन लगा हुआ है। माथे पर अर्धचन्द्र और सिर पर जटाजूट जिससे गंगा की धारा बह रही है और इनके साथ इनका वाहन नंदी भी नजर आता है। आइए जानते हैं आखिर शिवजी इनको क्यों धारण करते हैं।
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कोतवालेश्वर महादेव मंदिर - फोटो : amarujala
त्रिशूल
मान्यता है कि सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मनाद से जब शिव प्रकट हुए तो साथ ही रज, तम, सत यह तीनों गुण भी प्रकट हुए। यही तीनों गुण शिवजी के तीन शूल यानी त्रिशूल बने। इन तीनों गुण के बिना सृष्टि का संचालन नहीं हो सकता था, इसलिए शिव जी ने इनको अपने हाथों में धारण किया।
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shiv ji - फोटो : iStock
डमरू
डमरू का आकार रेत घड़ी जैसा है जो दिन- रात और समय के संतुलन का प्रतीक है। शिव भी इसी तरह के हैं।पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सरस्वती के प्रकट होने के साथ ही सृष्टि में ध्वनि का संचार हुआ। बिना स्वर और संगीत के ये ध्वनि विहीन थी। तब भगवान शिव ने नृत्य करते हुए 14 बार डमरू घुमाया, जिससे ध्वनि में व्याकरण और संगीत से छंद व ताल का उत्पन्न हुआ।

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shiv ji - फोटो : iStock
नाग
भगवान शिव के गले में हमेशा वासुकी नाम का नाग होता है। पुराणों में बताया गया है कि यह नागों के राजा हैं। सागर मंथन के समय इन्होंने रस्सी का काम किया था जिससे सागर को मथा गया था। कहते हैं कि वासुकी नाग शिव के परम भक्त थे। इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव जी ने इन्हें नागलोक का राजा बना दिया और साथ ही अपने गले में आभूषण की भांति लिपटे रहने का वरदान दिया।
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नंदी
पुराणों के अनुसार नंदी और शिव वास्तव में एक ही हैं। शिवजी ने ही नंदी रूप में जन्म लिया  था। ऋषि शिलाद ने कठोर तपस्या करके वरदान में अमर पुत्र को प्राप्त किया था, जो नंदी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। नंदी की कठोर तपस्या के बाद शिव ने उसे अपनी प्रिय सवारी के रूप में स्वीकार किया।
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shiv ji - फोटो : iStock
चन्द्रमा
शिव पुराण के अनुसार चन्द्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति  की 27 कन्याओं से हुआ था। इनमें चन्द्रमा रोहिणी से विशेष स्नेह करते थे। इसकी शिकायत जब अन्य कन्याओं ने दक्ष से की तो दक्ष ने चन्द्रमा को क्षय होने का शाप दे दिया। इस शाप से बचने के लिए चन्द्रमा ने भगवान शिव की तपस्या की। चन्द्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी जी ने चन्द्रमा के प्राण बचाए और उन्हें अपने शीश पर धारण किया।
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- फोटो : amar ujala
त्रिपुंड
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सती की मृत्यु के बाद शिवजी ने हवन कुंड की राख से अपने माथे पर तीन रेखाएं बनाईं, जो तीनों लोकों का प्रतीक होती है , इसे ही त्रिपुंड कहा जाता है मान्यता है कि त्रिपुंड लगाने से सभी देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
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shivling - फोटो : istock
गंगा
गंगा के वेग से पृथ्वी की रक्षा के लिए शिवजी ने उन्हें अपनी जटाओं में बांध लिया। मान्यता यह भी है कि देवी गंगा शिवजी के करीब रहना चाहती थी इसलिए धरती पर उतरने से पहले प्रचंड रूप धारण कर लिया था। इस स्थिति को संभालने के लिए शिवजी ने गंगा को अपनी जटाओं में स्थान दिया।
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