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सर्वपितृ अमावस्या पर पितरों को दें श्रद्धापूर्वक विदाई, जानें दीपदान की सही विधि और महत्व

Thu, 08 Oct 2026 01:21 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

सर्वपितृ अमावस्या पितृ पक्ष का अंतिम दिन माना जाता है। इस दिन ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान कर उन्हें श्रद्धापूर्वक विदाई देने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, विधि-विधान से किए गए श्राद्ध कर्म से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
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सर्वपितृ अमावस्या - फोटो : amar ujala

पितृ पक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या के साथ होता है। वर्ष 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्तूबर को मनाई जाएगी। यह तिथि उन पितरों के लिए विशेष मानी जाती है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया हो। इस दिन श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के साथ पितरों के निमित्त दीपदान करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सर्वपितृ अमावस्या की शाम पितरों के नाम से दीपक जलाकर उनका स्मरण करने से उन्हें श्रद्धापूर्वक विदाई दी जाती है। एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषाचार्य चंद्रेश शर्मा के अनुसार, इस दिन शाम के समय दीपदान का विशेष महत्व माना गया है। मान्यता है कि दीपक की रोशनी पितरों के मार्ग को प्रकाशित करती है और उनके प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम बनती है।

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किस दिशा में करें पितरों के नाम दीपदान? - फोटो : adobe stock

किस दिशा में करें पितरों के नाम दीपदान?
धार्मिक मान्यताओं में दक्षिण दिशा को पितरों से संबंधित माना गया है। इसी वजह से सर्वपितृ अमावस्या की शाम पितरों के निमित्त दीपक दक्षिण दिशा की ओर रखकर जलाने की परंपरा है। दीपदान करते समय पितरों का ध्यान करें और परिवार के दिवंगत सदस्यों की आत्मिक शांति के लिए प्रार्थना करें। इसके बाद श्रद्धा और सम्मान के साथ पितरों को विदाई देने की कामना करें।

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सूर्यास्त के बाद करें दीपदान - फोटो : adobe stock

सूर्यास्त के बाद करें दीपदान
पितरों के नाम दीपदान के लिए सूर्यास्त के बाद का समय उपयुक्त माना जाता है। शाम के समय स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा या दीपदान के स्थान को साफ कर लें। इसके बाद पितरों का स्मरण करते हुए दीपक प्रज्वलित करें। दीपक जलाते समय मन को शांत रखें और अपने पितरों की शांति एवं सद्गति के लिए प्रार्थना करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस तरह श्रद्धापूर्वक किया गया दीपदान पितरों के प्रति सम्मान प्रकट करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

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पितरों के दीपक में कौन सा तेल डालें? - फोटो : अमर उजाला

पितरों के दीपक में कौन सा तेल डालें?
पितरों के निमित्त दीपक जलाने के लिए तिल के तेल का प्रयोग विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इसके अलावा सरसों के तेल का दीपक भी जलाया जा सकता है। यदि संभव हो तो दीपदान के लिए मिट्टी के दीपक का इस्तेमाल करें। दीपक में पर्याप्त तेल डालें, ताकि वह कुछ समय तक लगातार जलता रहे। दीपक प्रज्वलित करने के बाद पितरों का स्मरण करें और उनकी शांति के लिए श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करें।

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सर्वपितृ अमावस्या की पूजा के लिए जरूरी सामग्री - फोटो : Freepik.com

सर्वपितृ अमावस्या की पूजा के लिए जरूरी सामग्री
सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध, तर्पण और पितरों के निमित्त पूजा करने के लिए घर की परंपरा के अनुसार सामग्री जुटाई जाती है। सामान्य तौर पर इन चीजों की जरूरत पड़ सकती है:

  • साफ पानी
  • काले तिल
  • कुश
  • चावल
  • आटा
  • घी
  • फूल
  • फल
  • धूप और दीपक
  • सात्विक भोजन की सामग्री
  • पिंड बनाने के लिए आवश्यक सामग्री
  • वस्त्र
  • दक्षिणा
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सर्वपितृ अमावस्या पूजा विधि - फोटो : freepik

सर्वपितृ अमावस्या की पूजा विधि

  • सर्वपितृ अमावस्या के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद पूजा और श्राद्ध के लिए निर्धारित स्थान को साफ कर लें। पूजा शुरू करने से पहले मन को शांत रखें और श्रद्धापूर्वक अपने पूर्वजों का स्मरण करें।
  • श्राद्ध कर्म की शुरुआत अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी और अन्य पूर्वजों को याद करके करें। जिन पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, सर्वपितृ अमावस्या पर उनका विशेष रूप से स्मरण किया जा सकता है।
  • इसके बाद अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार श्राद्ध का संकल्प लिया जाता है। इस दौरान जिन पितरों के निमित्त कर्म किया जा रहा है, उनका स्मरण किया जाता है। संकल्प की विधि और मंत्र गोत्र व पारिवारिक परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं, इसलिए आवश्यकता होने पर पुरोहित की सहायता लें।
  • सर्वपितृ अमावस्या पर पितरों के लिए तर्पण करना महत्वपूर्ण माना जाता है। सामान्य तौर पर तर्पण में जल और काले तिल का प्रयोग किया जाता है। तर्पण करते समय पितरों का ध्यान करते हुए उनकी शांति और सद्गति के लिए प्रार्थना करें।
  • जिन परिवारों में पिंडदान की परंपरा है, वे इस दिन पितरों के निमित्त पिंडदान कर सकते हैं। पिंड बनाने की सामग्री और इसकी पूरी प्रक्रिया अलग-अलग परंपराओं में भिन्न हो सकती है। तीर्थ स्थान पर पिंडदान करने पर वहां के नियमों और स्थानीय विधि का पालन करना चाहिए।
  • श्राद्ध के लिए घर की परंपरा के अनुसार सात्विक भोजन तैयार किया जाता है। इसमें चावल, दाल, पूड़ी, सब्जी, खीर और अन्य पारंपरिक व्यंजन शामिल किए जा सकते हैं। भोजन बनाते समय स्वच्छता का ध्यान रखें और परिवार की परंपरा में वर्जित खाद्य पदार्थों से बचें।
  • श्राद्ध की परंपरा के अनुसार ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है। अपनी सुविधा और स्थानीय परंपरा के अनुसार किसी जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना या भोजन सामग्री देना भी सेवा का अच्छा माध्यम हो सकता है। इस दौरान पितरों को श्रद्धा से याद करें।
  • सर्वपितृ अमावस्या पर जरूरतमंदों को अन्न, चावल, दाल, आटा, फल, वस्त्र या दक्षिणा का दान किया जा सकता है। दान अपनी क्षमता के अनुसार करें और इसमें दिखावे के बजाय सेवा की भावना रखें।
  • पूजा और श्राद्ध कर्म पूरा होने के बाद सभी पितरों की शांति के लिए प्रार्थना करें। इस अवसर पर उनके अच्छे संस्कारों और परिवार के लिए किए गए योगदान को याद करना भी इस दिन की भावना से जुड़ा है। पूर्वजों के बताए अच्छे मूल्यों को जीवन में अपनाने का संकल्प भी लिया जा सकता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
 
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